शिक्षक – किरण बाला

पूछूं गर मैं एक सवाल
कौन हूँ मैं, क्या है मेरी पहचान?
खो चुका हूँ अपना अस्तित्व
भूल चुका हूँ अपना नाम

क्या हूँ मैं कोई कठपुतली?
या फिर हूँ मैं कोई फिरकी
किसी खेल का हूँ मैं टट्टू
या घूमता हुआ कोई लट्टू

चारों ओर ये बेड़ियाँ कैसी?
तनाव, घुटन और बेबसी कैसी?
छाया हुआ है अंधेरा कैसा?
बस भूल चुका हूँ अपना पेशा

सब कहते हैं, मैं शिक्षक हूँ
देश की नींव का मैं रक्षक हूँ
कहता कोई मैं शिल्पकार हूँ
दे जो सबको आकार वो मैं हूँ

निगाहें सबकी मुझी पे टिकी हैं
सबकी आशाएँ,उम्मीदें जुड़ी हैं
जिम्मेवारियाँ सब अटी पड़ी हैं
बस पढ़ाने का ही समय नहीं है
मुझे तनिक विश्राम नहीं है
कहते सब मुझ पे काम नहीं है

मैं शिक्षक एक तमाशे जैसा
एक बे पैंदी के लोटे जैसा
पात्र सभी निभाए ऐसा
रंगमंच का कोई अभिनेता

मैं शिक्षक नियमों में बँधा हुआ सा
बस फाइलों में दबा हुआ सा
उपहास का पात्र बना हुआ सा
धमकी और गाली में फंसा हुआ सा
बन कठपुतली सा नाच रहा हूँ
मिले उलहानों को बाँच रहा हूँ

रहने दो मुझको बस शिक्षक
क्लर्क ना तुम मुझे बनाओ
अलग -अलग विभागों में
यूँ ना मुझे तुम उलझाओ
जमीर को मेरे तुम ना इतना गिराओ
हो जो फिट कहीं भी, वो पुर्जा ना बनाओ