सत्येन्द्र शर्मा – नव वर्ष – साप्ताहिक प्रतियोगिता

नववर्ष हूं मैं, आँगन में तुम्हारे आ रहा हूं,
प्रथम दिवस पर बच्चों सा खिलखिला रहा हूँ।
अभिनन्दन स्वीकार करते हुए तुम्हारा, हे मानव!
राग उज्जवल भविष्य के, मैं भी गा रहा हूँ।।

प्रथम दिन की प्रथम किरण वर्ष भर ज्योतिमय हो,
मेघा बरसे प्रभा की तुम पर, जग भर दीप्तिमय हो।
तिमिर छंट जाये, प्रज्ञा मिल जाये, मस्तिष्क को तुम्हारे
वर्ष का क्षण-प्रतिक्षण, दिन-प्रतिदिन सौभाग्यमय हो।।

आशायें तुमको मुझसे अनगिनत, मैं भी तो मन रखता हूँ,
तुम चाहो मुझको निखरा हुआ, मैं यह कामना करता हूँ।
मेरा एक भी दिन आतंकी हिंसा की पीड़ा से ना ग्रसित हो,
नववर्ष में किसी भी मनुष्य की भावना ना कुत्सित हो।।

ऐसा दिन ना देखूं, कोई तड़फे गरीबी से, कोई भूख से मर जाये,
कोई बालक वंचित रहे शिक्षा से, कोई बालिका अजन्मी रह जाये।
कोई मासूम शिकार बने नरभक्षी की, कोई दहेज हत्या हो जाये,
मेरा हर दिन शान्त, सुशील हो, किसी दुर्घटना की आवाज ना आये।।

हर मानव फूलों सा मासूम हो, चन्दन सा शीतल हो,
चहुं ओर बिखरे उष्मा ओज की, धरा ये, स्वर्ग से सुन्दर हो।
नववर्ष की प्रथम बेला स्वयं आकर सबको वरदान देती है,
कदमों तले हों सुख अथाह, बाँहों में खुशियों का समुन्दर हो।।

अपार आकाँक्षायें नववर्ष से सारा जग रखता है
नववर्ष शुभ हो हर कोई यह मंगल कामना करता है।
मैं केवल वर्ष हुआ, तो क्या हुआ, उम्मीदें मुझे भी हैं,
ना लगे मेरे दामन पर दाग यही आकांक्षा नववर्ष रखता है।।