सुभाष सैनी “सृजन”– जन्म मृत्यु – साप्ताहिक प्रतियोगिता

प्रथम स्फुरण हुआ धरा पर

नवजीवन की आशा में ।

सभ्यता के प्रांगण में

मंगल कारी प्रत्याशा में।।

सकल चराचर व्योम धरा सब

सीख रहे थे प्रस्फुटन को ।

तब प्रथम मानव जन्म हुआ

सभ्यता के संवर्धन को ।।

तब से अब इस पुण्य धरा पर

नित नूतन “सृजन” सजाया है ।

हिन्द राष्ट्र की निज भाषा में

राष्ट्र गौरव गाया है ।।

प्रज्ञा संबल राष्ट्र प्रेम की

अमर अलख निशानी है ।

शोर्य,पराक्रम,ज्ञान,ध्यान से

सोई मानवता जगानी है ।।

जन्म – मृत्यु बूंद तप्त तवे – सा

निज कर्मों की माया है ।

लख चौरासी देह धरकर यह

मानव जीवन पाया है ।।

जीवन मिला सौभाग्य उदित

निज राष्ट्र मान बढ़ाना है ।

राष्ट्र हित बलिवेदी पर

निज प्राण सुमन चढ़ाना है।।

सर्वाधिकार सुरक्षित , मौलिक रचना