व्यंग्य-जलवा तो प्रधानपतियों का है, जनाब!

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(एम. अफसर खां सागर) प्रधानपति… प्रधानपति…. प्रधानपति। मेरे एक अविवाहित मित्र वर्मा जी अल्सुबह कुछ इसी तरह बढ़बढ़ाते हुए मेरे घर आ धमके। मुझसे रहा न गया, मैने पूछ ही दिया अरे भई आखिर माजरा क्या है? ये क्या बके जा रहे हैं? आपकी नाराजगी का सबब क्या है? थोड़ी देर चुप रहने के बाद वर्मा जी बोलें… क्या बताउं, क्या हुआ? सुबह-सुबह एक कागज लेकर दस्तखत के वास्ते प्रधान जी के पास गया था, प्रधान जी तो सुबह का नास्ता बनाने में मशरूफ थीं सो सामना प्रधानपति से हो गया। सफेद कलफ डाले लम्बा कुर्ता-पाजामा पहने प्रधानपति महोदय चमचों की जमात से घिरे थें मैने दरयाफ्त किया प्रधान जी हैं? उत्तर मिला… काम बताओ। उन्ही से काम है। मैं हूं। इतना सुनना था कि मैं भौचक रह गया। जी दस्तखत करवाने हैं। महाशय ने झट कलम निकाल फरमाया कहां दस्तखत करना है? दस्तखत तो प्रधान जी के करवाने हैं, ये तो गैर कानूनी होगा। इतना सुनना था कि प्रधानपति महोदय गुस्से से लाल हो गयें, जाओ जहां कानूनी दस्तखत होता हो करवा लेना।ं बस इसी जलवा और रूआब की खातिर लोग प्रधानी का चुनाव लड़ रहे हैं। जीत हासिल करने के लिए दारू और मुर्गा का भोग लग रहा है मतदाताओं का। चुनाव से पहले विकास की डफली बजती है। जनता भी कहती है कि आने दो चुनाव सबक सिखा दिया जाएगा। मगर ऐन चुनाव से पहले शराब, मुर्गा और पैसे का भोग लगने लगता है। कुछ लोग तो साइबेरियन पक्षियों की तरह फड़फड़ाते नजर आते हैं मालदार प्रत्याशीयों के साथ। शराब की शीशी से विकास का बुलबुला निकलने लगता है। महिला सीट हो या पुरूष प्रधानी तो पति ही करता है नाम मात्र की होती हैं महिलाएं! इतना कहने के बाद वर्मा जी बुदबुदाने लगते हैं… हूं सरकार को भी न जाने क्या हो गया है कि चुल्हा-चैका करने वालों को प्रधान बना देती हैं?

कुछ वक्त शान्त रहने के बाद वर्मा जी चुप्पी तोड़ते हुए बोलते हैं कि आखिर आप कोई उपाय बताइए? अरे… लोकतंत्र है, प्रधान जी के यहां दस्तखत नहीं हुआ तो क्या, आप उनसे उपर जाइए और प्रमुख जी से दस्तखत करवा आइए। पुर इत्मीनान हो कर वर्मा जी ने अपनी फाइल कांख में दबाई और चलते बने। मैं भी दूसरे कामों में मशरूफ हो गया। अगले दिन अभी सूरज ने अपनी आंख भी ठीक ढंग से नहीं खोली होगी कि वर्मा जी लगे दरवाजा खटखटाने। अरे उठो भी की सोये ही रहोगे। …लो फिर मुसीबत हाजिर। अच्छा भई आ रहा हूं। दरवाजा खुला। वर्मा जी भद्दी-भद्दी गालियां देते अन्दर घुसे। अरे जनबा… सुबह-सुबह तो ईश्वर का नाम लीजिए। ये क्या बके जा रहे हैं। प्रमुख चालीसा पढ़ रहा हूं। गया था प्रमुख जी के पास। वहां का मंजर देखकर होश फाख्ता हो गये। चारों तरफ से राइफलधारी गिरोह मानो वीरप्पन या ददुआ ने उनको अपनी विरासत दे दिया हो जैसे! बस इतना ही पूछा था कि प्रमुख जी कहां हैं? मुसल्लत हो गयी मुस्टंडों की टोली। कौन… कहां से… क्या काम है? अरे भई कोई चोर डाकू थोडे हूं। बस प्रमुख जी से मिलना है। बैठिए…शायद यही कह वे चले गयें। तवील इंतजार व गहन चेकिंग के बाद बाद मेरी पेशी हुई। कद-काठी के मजबूत, विदेशी चश्मा व सूट पहने एक सज्जन ने रौबीले आवाज से पूछा, क्या काम है? जी दस्तखत करवाने हैं प्रमुख जी के। लाओ कहा करना है। जी महोदया के दस्तख्त करवाने हैं। बदतमीज, बेहूदा तेरी ये मजाल कि प्रमुखपति से जबान लडाता है। फिर क्या था मुसटंडों ने धक्का मार के बाहर कर दिया। वर्मा जी की इस भयावह दास्तान से मैं भी दहल उठा।

कुछ देर माथ-पच्ची के बाद मैने हिम्मत जुटाते हुए का कि वर्मा जी एक आखिरी कोशिश करिये चेयरमैन जी से मिल आइये। तजवीज खराब न थी सो वर्मा जी उठे और चलते बने मगर वारनिंग भी देते गयें  अगर कुछ हुआ तो तुम समझना। मैने उपर वाले से प्रार्थना किया कि अब कुछ गडबड ना हो वरना मेरी हजामत बनना तय है। तीसरे दिन मैं क्या देख रहा हूं कि वर्मा जी उखडे-उखडे मूड में मेरी घर की जानिब बढे आ रहे हैं। मैने दिल में ख्याल किया कि लगता है आज हजामत बनना तय है। दरवाजा पर वर्मा जी ने दस्तक दी और लगे चिल्लाने। आवाज सुनकर मेरे पसीने छूटने लगे। कुछ देर बाद हिम्मत जुटा कर दरवाजा खोला। पहले पानी मांग कर वर्मा जी ने गला तर किया फिर लगे लेक्चर देने। भाई साहब… सुबह से लाइन में खडा था। पूरे दो घंटे बाद खद्दर धारीयों का धुंध छटा। मेरी हाजिरी हुई। किससे काम है का सवाल सुनते ही मेरा पारा गरम हो गया। चेयरमैन साहब से। गुस्ताख… साहिबा बोल। इतना सुनना था कि मैं चलता बना क्योंकि फिर चेयरमैनपति से मुलाकात करना मेरे बस के बाहर था। वैसे भी पतियों का जलवा मुझपर भारी सबित हो चुका था। भाड में जावे कागज और भाड में जाये दस्तख्त।

समझ में नहीं आता है कि ये पति खुद को क्या समझते हैं? न जाने कौन सा पावर मिल गया है इनको? सरकार को भी न जाने क्या हो गया है कि एक पद पर दो-दो व्यक्ति को बिठा रखा है? आखिर नकली व असली का फर्क कैसे होगा? चक्कर पे चक्कर काटने के बाद घनचक्कर हुए वर्मा जी ऐसे तमाम सवालों पर बड़ी गम्भीरता से विचार करने में मुबतिला हो गयें। कुछ देर बाद दिमाग दौड़ाने के बाद अचानक वर्मा जी उछल पड़े। जैसे कोई ब्रम्हास्त्र पा गये हों। चिल्ला उठें। मैं भी पति बनूंगा…. मैं भी पति बनूंगा। वर्मा जी की ऐसी हालत देख मैं सहम गया… कहीं वर्मा जी दिमागी रूप से….। अभी उम्र ही क्या है, शादी भी नहीं हुई। वर्मा जी बोले सुनो भई… आज जमाना पतियों का है। जिधर देखो उधर दिखते है नामधारी पति। प्रधानपति, प्रमुखपति, चेयरमैनपति, विधायकपति, सांसदपति, मंत्रीपति आदि। रौब, जलवा और पावर भी है इनके पास है। ज्यादातर पत्नीयां तो बस नाम की होती हैं पद पर काम तो यही पति करते हैं। रूतबा और रूआब तो इनके पतियों का ही होता है। फीता काटना हो या किसी समारोह का उद्घाटन सब जगह पति ही जाता है। लोकतंत्र में नाम पत्नीयों का और काम पतियों का। क्या बात है? तो मैं भी क्यों न पति बन जाउं। कौन सा पति बनेंगे जनबा पहले शादी तो कीजिए? इतना सुनना था कि वर्मा जी के पेशानी पे सिकन आ गई। अचानक उछल पड़े। जब तक पति नहीं बनता, तब तक मैं रोडपति बन जाता हूं। इतना कह कर वर्मा जी रोड की जानिब निकल पड़े।

 


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