हमारे बीच भी था हाकी का ध्यानचन्द

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Badruddin khan

बदरूद्दीन खाँ का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिला के खित्ते कमसारोवार के मौजा गोडसरा गाँव के ‘‘हाँता’’ नामक स्थान पर हुआ था। यह युवा  हाकी खिलाड़ी जब अपनी हाकी स्टीक के सहारे गेंद को अपनी दौड़ की बेमिसाल रफ्तार देता तो खेल के मैदान में बैठे सभी दर्शकों की हर जुबान से  यही निकलता ‘‘अब गोल होना तय है। जी हाँ!! हाकी के उस सुनहरे दौर की बात है, जब लाल शाह बुखारी, जयपाल सिंह तथा मेजर ध्यानचन्द द्वारा  भारत को ओलंपिक में गोल्ड मैडल प्राप्त हुआ तथा 1956 ई0 में मेजर ध्यानचंन्द के एक बेहतरीन खेल की बदौलत, उन्हें पदम् विभूषण सम्मान से  भारत-सरकार द्वारा नवाजा गया और उनके जन्म दिवस पर हम सभी को भारतीय राष्ट्रीय हाकी खेल दिवस का दर्जा मिला, जो हम सब हर साल (  29 अगस्त) को खेल दिवस के रूप में मनाया करते हैं। उस युग के खिलाडि़यों का असर भी देश के आम खिलाडि़यों पर भी था। बहुत सी प्रतिभाएं  लालशाह बुखारी, जयपाल सिंह, मेजर ध्यानचन्द्र के रूप में उदय हो रही थी, उन्ही होनहारों में एक युवा खिलाड़ी मो0 बदरूद्दीन खाँ का भी उदय इस  खित्ताए-कमसारोबार में धीरे-धीरे हो रहा था, जिसकी हाकी स्टीक में जादू तो नहीं लेकिन उसके हाथें और चालों में फनकारी तो जरूरत थी, तभी तो वह बहुत ही कम अरसे में इस खित्ते और जिले से दूर-दराज हाकी खेल पे्रमियों का हीरो बनता जा रहा था। शहीद बदरूद्दीन के सहपाठी एक बुजुर्ग षरीफ खाँ दिलदारनगर गाँव के बताते है कि बदरूद्दीन हमारे साथी थे और उन्हों ने दौड़ की कई प्रतियोगिताओ में बनारस तक जाकर जीत हासिल किया था और हाकी में बहुत नाम कमाया था परन्तु उस होनहार युवा महान खिलाड़ी की रफ्तार अचानक थम जाती है। गोडसरा के मो0 मोहीउरूद्दीन खाँ उर्फ मोहा खाँ तहसीलदार के घर 2.07.1933ई0 को जब एक बच्चा जमींदारी परिवार में पैदा हुआ था तो किसी को क्या पता था कि यह एक दिन अपने खित्ताए कमसारोबार के वकार को बुलन्द करने के लिए शहादत की जाम पी लेगा, लेकिन ठीक ऐसा ही हुआ। उस जमाने में बनारस जोन की तरफ से पहली मरतबा गाजीपुर जिले के कमसारोबार खित्ते में मुस्लिम राजपुत इन्टर कालेज, दिलदार नगर यानी वर्तमान नाम ’’एस0के0बी0एम0 इण्टर कालेज, दिलदार नगर’’ के मैदान पर जोनल हाकी टूनामेन्ट मैंच का आयोजन होना हुआ। जिसमें बदरूद्दीन खाँ की ’’गाँधी मेमोरियल इण्टर कालेज, दिलदार नगर,’’ की टीम तथा ’’हिन्दू इन्टर कालेज, जमानिया’’ की टीम नें फाइनल में प्रवेश किया। यह हाकी फाइनल मुकाबला शुरू हुआ तथा खेल शुरू होते ही बदरूद्दीन खाँ के हाॅकी स्टीक में गेंद को आते ही मानो हवा के माफिक गेंद को मुखालिफ टीम के गोल पोस्ट में ले जाकर एक गोल दाग दिया। लेकिन जैसे ही वह अपने गोल कोच की तरफ वापस आ रहे होते हैं तो मुखालिफ टीम के खिलाडि़यों ने उनका घेरा बन्दी कर धोखेबाजी से पीछे से उनके सिर पर हाकी स्टीक से हमला कर, वह शर्मनाक कारनामे का अंजाम देते हैं जो एक खेल जगत को शर्मसार करता है तथा उसी में बदरूद्दीन जख्मी हो बेहोश गिर पड़ते हैं, और उन्हें फौरन डा0 श्याम नारायण चतुर्वेदी तथा उनके कहने पर उन्हें फौरन ’’एडवर्ड किंग हास्पिटल, कबीर चैरा, बनारस में दाखिल कराया गया तथा उन्हें तो जामें शाहादत पीनी भी तो दवा क्या काम करती आखिरकार वो कुछ लमहों बाद (23/01/1955 ई0) को दोपहर के 01.20 बजे उसी हास्पिटल में अपना हुनर समेटे, इस इस दुनियाफानी को अलविदा कह गए, उसके बाद उनके जसदे खाकी को कालेज मैनेजर मु0 शमसुद्दीन खाँ आदि लोगों द्वारा सड़क के रास्ते कार द्वारा दिलदार नगर गाँव को लाया गया। जहाँ रोक कर लोगों द्वारा जामा मस्जिद रोड पर गाड़ी रोक उनके जस्दे खाॅकी यानी शव का आखिरी दीदार किए। लम्हें के चश्मदीद गवाह मास्टर हाजी मु0 करीम रजा खाँ दिलदार नगरी बताते हैं कि उसके बाद उनके जस्दे खाॅकी को उसी कालेज एस0के0बी0एम0 की रणभूमि पर ले जाया गया जहाँ पर उन्होंने शहादत की जाम पिया था, उसके बाद उस कालेज के मैनेजर मो0 शमसुद्दीन खाँ के सूझ-बूझ के कारण, उनके कुनबे से आजजी करके और उनकी कब्र पर कमसारोबार से आए समस्त जाने-माने लोगों द्वारा मिट्टी डालकर ’’मिलिट्री गाड आफ आनर्स’’ के साथ दफन कर दिया जाता है। परन्तु उन्हें तो दफन तो कर दी जाती है लेकिन उनके तूफानी तेवर और तूफानी खेल रफ्तार की दास्तान के चर्चे आज भी कमसारोबार खित्ते के हर खास और आम लोगों पर भी जारी रहता है। तथा उस वक्त कमसारोबार के सभी करीबी गाँवों में चहारम  के रूप में (27.01.1955 ई0) को कुरानखानी आदि और उनके कब्र पर भी कालेज पे समस्त आये लोगों द्वारा फातिया आदि का मुजायरा भी किया गया तथा कई वर्षों तक पढ़ने का यह बेमिसाल शिलशिला जारी भी रहा तथा यह माना जाता है कि हाॅकी आदि सभी खेलों के तवारीख में शायद ही ऐसा कोई खिलाड़ी हो जो अपने खेल  के दरम्यान उसी रणभूमि में शहीद हुआ हो तथा अपनी आखिरी आरामगाह के लिए दो गज जमीन भी हासिल कर लिया हो। इन सब बातों को देखने और समझते हुए उस कालेज में तत्कालीन मैनेजर मो0 शमसुद्दीन खाँ और सदर अंजुमन, मो0 डिप्टी सईद खाँ द्वारा उनके याद में ’’शहीद बदरूद्दीन मोमोरियल, लाईब्रेरी और हाल’’ का निर्माण (21.12.1957ई0) को बिस्मिल्लाह खाँ, बारावी के हाथो कराई गई तथा उनके मजार शरीफ का निर्माण और उनकी देखरेख के लिए एक मुतवरिख भी रख दिये थे। इसके अलावा उनके पैतृक गांव में उनके नाम पर ’’बदरूद्दीन मेमोरियल क्लब’’ द्वारा सभी प्रकार के खेलों में अपने खित्ते और जिले से दूर-दराज तक जाकर सभी खेलों को अमली जामा आज भी पहनाया करते हैं। इसके अलावा उनके साथी खिलाड़ी हाजी सोहराब खाँ, सरजेन्ट मुस्ताक खाँ व साथी सहपाठी हाजी सदरूद्दीन खाँ दरोगा, शफीक खाँ दिलदार नगर आदि सभी लोगों का कहना है कि बदरूद्दीन बहुत ही अच्छे और एक नेक इंसान थे तथा उनके खेल तारीफ में यह कहते कि बदरूद्दीन अपने दौड़ की बदौलत हाकी के अलावा फुटबाल, कबड्डी, ऊँचा-लम्बा कूद आदि में भी अपने खित्ते से दूर दराज जाकर महारत हासिल कर चुके थे। बनारस जोन में छोटे-बड़े कई खेल सम्मानों से नवाजे भी गये थे और कहते हैं कि गंेद के पीछे वे नहीं उनके पीछे गेंद दौड़ती थी। यदि आज इस दुनिया में जिन्दा होते तो राष्ट्रीय हाकी के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय हाकी टीम में होते। यादों की लकीरों का अपेक्षाओं गर्द कहीं हावी न हो जाये इसके लिए जरूरी है कि उस शहीद के नक्शे कदम को गहरा बनाया जाय ताकि सभी खेल प्रेमियों और आने वाले तालिब इल्मों आदि को इनका दर्श हमेशा मिलता रहे परन्तु विगत कुछ दिनों शहीद बदरूद्दीन खां के साथी हाकी खिलाड़ी मसीहूज जमा खां और उनके पोते मो0 शहाबुद्दीन खां आदि कमसारवासियों द्वारा अपने क्षेत्र के पूर्व सपा विधायक ओम प्रकाश सिंह (वर्तमान) में उ0प्र0 पर्यटन मंत्री से ‘‘शहीद बदरूद्दीन मेमोरियल’’ राष्ट्रीय हाकी स्टेडियम व स्पोर्ट्स काम्पलेक्स, मजार शरीफ का निर्माण आदि की भी मांगे की गयी थी, लेकिन अभी तक उन पर सरकार द्वारा न ही ऐसा कोई कार्य या तरजीह दी गयी हो जो इस कमसारोबार के क्षेत्रवासियों को बहुत ही कसक की बात है। कमसारोबार के क्षेत्रवासियों का सरकार से यह मांग है कि शहीद की यादगार में सच्ची खिराजे अकीदत पेश करे।

एम. अफसर खां सागर

 


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