कारवां गुजर गया और गुबार ही गुबार रहा

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M.Afsar Khan

(एम. अफसर खां सागर)    रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकायटूटे तो जुड़े नाहीं, जुड़े तो गांठ पडि जाए।

इंसानी फितरत ने समाज के दो तबकों को इत तरह बांट दिया है कि विश्वास की डोर कमजोर ही नहीं बल्कि टूट चुकी है। मानवता कराह उठी और हालात ने दो समाजों को नफरत के आग में जला दिया। असल में नोएडा के दादरी गांव में बकरीद के त्यौहार के बाद गाय के मांस के शक में अखलाक व उसके परिवार के साथ जो हुआ उसने समूचे देश सहित मानवता को शर्मशार तो किया ही लोगों को अन्दर से हिला कर भी रख दिया है। जब विश्वास की डोर कमजोर होती है तो इंसान के अन्दर डर का साम्राज्य कायम हो जाता है। यह असफलता समाज के साथ-साथ सरकार के कानून-व्यवस्था नाफिस करने वालीं संस्थाओं से उठती विश्वास व सामाजिक सौहार्द के बिखरते ताना-बाना की है। धर्म लोगों के लिए अफीम है। इसी उक्ति का इस्तेमाल कर कुछ लोगों ने समाज को फिरकों में बांट कर इस धर्म रूपी नशे में लाकर आपस में लड़ा दिया है! ये भीड़ सामान्य पुरूषों के साथ शायद ना चल सके! वजह साफ है इंकलाबी व जुनूनी उन्माद साधारण पुरूष नहीं पैदा कर सकते हैं। शायद यही वजह है कि लोग अमन की बात सुन कर कांप उठते हैं और खौफजदा हो जाते हैं। आखिर लोग क्यों न थर्रा जाएं जब किसी इंसान को धर्म के नाम पर उन्मादी भीड़ महज इस लिए पीट-पीट कर कत्ल कर देती हो कि उसके पास गो-मांस होने का शक हो। जिस तरह गिद्ध और कुत्ते किसी मरे हुए जानवरों को नोच-नोच और घसीट कर खाते हों लगभग वैसा सलूक अखलाक के साथ उस दादरी में हुआ जहां वो लम्बे अरसे से उन्हीं लोगों के बीच रहा करता था। आखिर क्या वजह हुई होगी कि चन्द लोग उन्माद के नशे में इस दर्दनाक व घृणित कार्य को अंजाम देते हैं? इसके पीछे कौन सी जेहनियत है यह सवाल अब भी सबके दिमाग में तैर रहा है।

बदलते सामाजिक परिवेश में मानवीय नजरिया पर राजनीति का गहरा अक्स पड़ा है। धर्म-जात में बंटते समाज में फिरकापरस्त ताकतों ने लोगों को आपस में लड़ा कर अपना उल्लू सीधा करना बखूबी सीख लिया है। डिवाइड एण्ड रूल वाली सियासत का दौर चालू है। विकास की जगह सियासी मुद्दा अन्त में जाकर जाति पर ही टिक जाता है। इा वजह से  कुछ फिरकापरस्त ताकतों का फलसफा आसानी से लागू हो जा रहा है! अब सवाल बेरहमी से होन वाले कत्ल व उसमें सरकारी अमला की मुस्तैदी का नहीं रहा। यहां सवाल है सरकार की नीयत व नीयति का है। अक्सर सरकारें मौत के बाद सरकारी मरहम के तौर पर धन का लेप लगा देती हैं ताकि पैसे के चमक के आगे जख्म का चित्कार कराह कर रह जाए और सारा मामला कत्ल और खून से लबरेज अनसुना चीख बनकर रह जाए। अखलाक के कत्ल के बाद सियासी जमातें परिवार के जख्मों पर मरहम की जगह सियासी लेप लगा कर वोट पर गिद्ध नजर गडाये हुए हैं। अखलाक के परिवार से मिलने वाला हर सियासी आदमी दावा तो हमदर्दी का कर रहा है मगर असलियत सबको मालूम है और साफ दिख भी रहा है। किसी को हिन्दु वोट की पड़ी है तो कोई मुस्लिम वोट की सोच रहा है। ऐसा मालूम पड़ता है कि कत्ल अखलाक का न हो कर एक समुदाय का हुआ हो और मुल्जिम चन्द उन्मादी न हो कर पूरा एक समुदाय बन गया हो? तभी तो कत्ल काईे शाजिस तो कोई दुर्घटना बताने पर तब तुला है जब जांच रिर्पोट आना बाकी हो।

सबसे बड़़ा सवाल यह है कि क्या मुल्क में हर कत्ल और फसाद को सियासी चश्में से देखना जायज है? क्या सियासतदां इंसानों को धर्म और जाति से उपर उठकर भारतीयता के नजरिये से देखेंगे? जब तक सियासत व सियासतदां की मंशा साफ न होगी तब तक नागरिकों व समाज की भागीदारी किसी भी अच्छे काम में होना सम्भव नहीं है। नागरिकों व समाज के पास सोचने की सलाहीयत है और उसका इस्तेमाल भी वह करना बखूबी जानती है मगर हालात में सियसी जहर घोलने वाले लोग उसे गुमराह करने में कामयाब हो जा रहे हैं। साम्प्रदायिकता फैलाने वालों के जाल में फंसकर आम लोग रिश्तों की तासीर को भूल कर आपस में लड़ने पर आमादा हो जा रहे हैं। सरकार के साथ लोगों के हिमायत व हिफाजत का दंभ भरने वाली सियासी जमातों को चाहिए कि समाज में पनपे अविश्वास को दूर करने के लिए सियासी चश्में के इस्तेमाल के बजाय घटती मानवीय संवेदना को दो समुदाय के बीच मुहब्बत कायम कर लोगों को आपस में जोड़ने की ईमानदार पहल किया जाए। यहां सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि कानून-व्यवस्था नाफिस करने वाले अमलों को ताकीद किया जाए कि पक्षपाती रवैया से उपर उठ कर कानून को सामने रख कर लोगों के हिफाजत व अमन कायम करने के लिए हर कठोर व मुम्किन कदम उठाये। तब कहीं जाकर समाज को पास लाया जा सकता है। जब समाज पास आयेगा तक विश्वास बहाली का रास्ता बनता नजर आयेगा वर्ना बातें तो होती रहेंगी विश्वास बहाली की सियासी जमात जैसे गिद्ध मुरदार में जीने की राह तलाशती हैं वैसे कत्लो और दंगों पर वोट की खुराक तलाशती रहेगी! ऐसे में समाज के पास आपसी रंजिश निकालने व लड़ने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता नजर आता है? रहीम दास के शब्दों में प्रेम की डोर अगर एक बार टूट जाये तो जल्दी जुड़ती नहीं, अगर जुड़ भी जाए तो जुड़ने पर गांठ रह जाता है। जख्म भर जाने पर भी घाव का निशान रह जाता है। ऐसे में दादरी सहित पूरे मुल्क के लोगों में पनपे अविश्वास को दूर करने के लिए ईमानदार प्रयास के साथ आपसी भईचारे की रवाज को कायम करना होगा। जरूरत है वक्त के रावणों को कुचल देने की ताकि मानवता के चेहरे पर कल्त के खूनी छींटे ना आने पाये।

(लेखक युवा पत्रकार हैं, समसामयिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं)

 


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