पुस्तक समीक्षा-पारम्परिक मूल्यों का यथार्थ चिन्तन

Book HN Dixit (2)

(एम. अफसर खां सागर)  पुस्तक- हृदयनारायण दीक्षित और उनकी पत्रकारिता (शोध ग्रन्थ), लेखक- डा0

अनुभव अवस्थी

प्रकाशक- पुस्तक पथ, साकेत नगर, वाराणसी, मूल्य- 350 रूपये

(पेपर बैक)।

पत्रकारिता में अनेकों प्रशंसनीय शोध हुए हैं, इन शोधों से पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगों को समझने व

उनके कार्यों को करीब से देखने का मौका मिलता है। पत्रकारिता के छात्रों को उनसे सीखने का भी अवसर

प्राप्त होता है। इसी क्रम में प्रस्तुत पुस्तक ‘हृदयनारायण दीक्षित और उनकी पत्रकारिता’ डाॅ0 अनुभव

अवस्थी द्वारा सूक्ष्म नजरिए से किया गया शोध है। इस ग्रन्थ में पत्रकारिता को राष्ट्रवाद से जोड़कर

समझने का प्रयास किया गया है। यह शोध प्रख्यात पत्रकार, स्तम्भकार व राजनेता हृदयनारायण दीक्षित

की पत्रकारिता के भारतीय सांस्कृतिक तत्व पर किया गया है। वर्तमान दौर में दीक्षिजी ऐसे पत्रकार हैं,

जिन्होने राजनीति के साथ पत्रकारिता को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़ा है। वे स्वंय लिखते है ‘समजासेवा

के लिए राजनीति में सक्रिय हूं अैर भारतीय संस्कृतिमूल विचार-संवर्द्धन के लिए पत्रकारिता में। इस शोध

ग्रन्थ में डाॅ0 अनुभव अवस्थी ने हृदयनारायण दीक्षित के व्यक्तित्व व कृतित्व के अलावा उनकी पत्रकारिता

के साथ पत्रकारिता को उनके अवदान पर गहनता से प्रमाणिक चर्चा किया है। दीक्षितजी से लेखक ने एक

लम्बे साक्षात्कार के द्वारा उनको समझने व उनके विचारों को उकेरने का काम किया है। पुस्तक में

पत्रकारिता के विविध आयाम व भारतीय पत्रकारिता की विकास यात्रा का भी विस्तार से जिक्र किया गया

स्वयं दीक्षितजी ने पुस्तक के बारे में चर्चा करते हुए लिखा है कि यह किताब साधारण पत्रकार और कार्यकर्ता

की मनोदशा की साधारण कथा है। इसका शोध भाग पत्रकारिता के सिद्धान्तनिष्ठ इतिहास का स्मरण है।

अनुभव ने हृदयनारायण दीक्षित के पत्रकारिता इतिहास पर गहन दृष्टिपात किया है। वे लिखते हैं कि

दीक्षितजी गरीबों के दुःख-दर्द को मुद्दा बनाने, आर्थिक और सामाजिक विषमता दूर करने के लिए लिखते

हैं। वे सांस्कृतिक प्रवाह की गति को तेज करने व राष्ट्रीय एकता की मजबूती के लिए भी हैं। उन्होने हिन्दी

पत्रकारिता को नई शैली प्रदान किया है। पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रभाव पुष्ट करने की प्रबल इच्छा ने

इनके लेखकीय व्यक्तित्व की बुनियाद डाली। लेखक से साक्षत्कार के दौरान दीक्षितजी ने अखबारों में छपने

वाले आलेखों पर चर्चा करते हुए बताया कि स्तम्भ लेखन में सामयिक विषयों का विवेचना बढ़ना अच्छी

बात है। अपने समय की गतिविधियों से अवगत होना जनसामान्य की स्वाभाविक इच्छा होती है। समाज

की गतिशीलता के लिए सूचना के साथ ज्ञान भी चाहिए, इस दृष्टि से आधुनिक पत्रकारिता समृद्ध है।

लेखक ने पुस्तक में पत्रकारिता के विविध आयमों पर बिन्दुवार चर्चा किया है। इसके अलावा भारतीय

पत्रकारिता के विकास यात्रा को कालखंडों में विभाजित कर तथ्यात्मक और रोचक ढ़ंग से पेश किया है। कुल

मिलाकर यह पुस्तक गांव के एक गरीब युवा के नेता और पत्रकार बनने की अंतरंग पहलुओं पर हल्की सी

रोशनी डालती है। पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने वालों के लिए यह पुस्तक निःसन्देह लाभदायक सिद्ध

होगी, साथ ही हृदयनारायण दीक्षित व उनके पत्रकारिता को अधिक गहराई से जानने की इच्छा रखने वालों

के लिए यह प्रवेश द्वार साबित होगी।