ईमानदार जी – अरविन्द पाठिक

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बैठे ठाले टी वी ऑन किया तो पता चला ईमानदार जी की प्रेस कांफ्रेंस चल रही है .ईमानदार जी बहुत गुस्से में थे .मुझे लगा हो ना हो ईमानदार जी का मफलर चोरी हो गया हो और वे इसकी जांच लोकपाल से कराने की बात करा रहे हों पर उनके लाये लोकपाल को जोकपाल तो उनके कभी के फ्रेंची फ्रेंड रहे  आभूषण जी पहले ही बता चुके हैं फिर तो मामला जरूर सी बी आई को भेजने की बात कर रहे होंगे इसीलिये बार बार सी बी आई का जाप कर रहे हैं .पर उनके आलाप से ध्यान हटकर जरा नीचे गया तो पाया मफलर तो बदस्तूर शंकर जी के सांप की तरह गले में लिपटा फुफकार रहा है .ये अलग बात है सांपनुमा यह फुफकार ईमानदार जी के मुखारविंद से ही प्रस्फुटित हो रही थी .काफी देर तक बहुत ध्यानपूर्वक समझने के बाद समझ में आया कि सी बी आई ने छापा मार दिया है .ईमानदार के आफिस पे .ये समझ में आते ही मेरा मन तो हैरत के महासागर में छपाक से कूद गया कि सी बी आई में सारे के सारे पगलैट ही भरे हैं के —,जिन ईमानदार जी की  नाम से ईमानदारी शुरू होके समाप्त हो गयी उनके दफ्तर पे छापे.जिनके साहचर्य में अविश्वास विश्वास में और चौर्य कला दक्ष युधिष्ठिर और यक्ष में परिवर्तित हो जाते हो ऐसे ईमानदार जी के यहाँ छापे—मरा-मरा  —-.अब आप सोच रहे होंगे कि –मरा मरा क्यों -?तो भाई डी के बोस की तरह मरा में भी तासीर है  कि बार बार कहने पर अर्थहीन  अर्थवान हो जाता है और जब रत्नाकर मरा मरा कहकर वाल्मीकि हो सकते हैं तो मेरे जैसा अधम भी मोक्ष पा सकता है .फिर जिनके पिंजरे में सीबी आई कैद है ,राम के नाम के होर्डिंग ,बैनर और नारों और सत्ता के गलियारों पर भी तो उन्ही का कब्जा है .ऐसे में राम राम कह  के हम ईमानदार जी के दुश्मनों के खेमें में खड़े होने का रिस्क नहीं ले सकते .आप खुद ही सोचिये जब  कृष्ण जन्मभूमि सेवी तक ईमानदार जी को गले से लगाकर स्वयं को कृत कृत्य  समझते हों .जिन पर  ममता बार बार उमड़ घुमड़ कर बरसने को तैयार हो .कलमाड़ी से लेकर ए राजा तक के लिए आखिरी उम्मीद बन चुके ईमानदार जी के दफ्तर पर छापे की हिम्मत सी बी आई जुटाने लगे तो समझो अच्छे दिन लाने वालों के बुरे दिन आने वाले हैं  .जिस जमाने में ईमानदार  जी की सरकार के सचिव ने भ्रष्टाचार किये उस जमाने में वो आंटी जी की सरकार के सचिव थे .तो छापे पे आंटी जी के यहाँ डालने थे .ईमानदार जी ठहरे ईमानदारी के पारस पत्थर उनके सम्पर्क –संसर्ग में आकर सचिव हो या चपरासी और कुछ भी रह सकता है पर भ्रष्ट तो नहीं ही रह सकता .एक जमाना था जब आंटी जी की फाइल बना डाली थी ईमानदार जी ने पर उस फाइल में यक्को कागज़ ऐसा ना लगा पाए ईमानदार जी, जो आंटी जी को कृष्णजन्मभूमि की यात्रा करवा पाते  .अब ईमानदार जी तो अपनी गलतियों से सीख सीखकर ही यहाँ तक पहुंचे हैं तो ईमानदार जी ने अपनी विफलता पे थामस अल्वा एडिसन की तरह बार बार सोचा विचारा और जांचा परखा और एकदम से उनके दिमाग की बत्ती जली .उछल ही तो पड़े  आर्कमिडीज की तरह –‘यूरेका ‘यूरेका ‘ नहीं –आई आई टी वाला कहते हुए–तभी तो हमारे जैसा टैलेंटेड –,बड़े काम का है भाई इसी ने आंटी जी का कागज़ पत्तर दुरस्त करके रखा –‘दुनिया में लाख यार दोस्त बना लो पर जो भरोसा स्कूल कालिज के जमाने के यारों पे होता है वैसा किसी और पे हो ही नहीं सकता .अपना आई आई टी वाला यार सचमुच बड़े काम का है .ऐसे काम के यार के यहाँ छापा वो भी ईमानदार जी का सचिव बन जाने के बाद.ईमानदारी के प्राइमरी स्कूल की मार्कशीट से लेकर डी० लिट्० तक की डिग्री पर पिछले पांच साल से ईमानदार जी का फोटू छप रहा है और ये ससुरी सी बी आई ईमानदार जी के सचिव कम स्कूली यार के यहाँ छापा डाल रही है .माना पहले कभी कहा था कि प्रधानमन्त्री तक की जांच होनी चाहिए भ्रष्टाचार में पर इसका मतलब ये थोड़े ही था कि ईमानदार जी के यहाँ  ही छापेमारी शुरू कर दो ,फिर अब तो सी बी ई वाला  तोता  जिस  पिंजरे में बंद है उसका कोई स्थायी मालिक तो है नही आज तुम हो तो क्या पता कल को ईमानदार जी हो जाये और फिर डायन भी सात घर छोड़ के शिकार करती है तुमने तो कोई लिहाज़ ही नहीं किया अरे अब तो ईमानदार जी और तोते वालों दोनों की बिरादरी भी एक ही है . ईमानदारी का धर्म छोड़कर कब के राजनीती धर्म को अपना चुके ईमानदार जी को आज भी पुराने गज से नापने की गलती करोगे भाई तो फिर मीडिया की नौटंकी करने में ईमानदार जी से पार ना पा सकोगे .फिर  ना कहना बताया नहीं .जब अपना कोई सगा वाला फंसता है तो कैसा लगता है ? कुछ कुछ तो एहसास हो ही गया होगा ईमानदार जी को पप्पू समझा था क्या अरे पप्पू बच्चा है और रहेगा पर ईमानदार जी की अदाकारी के तो दिलीप साहब भी कायल हैं .दिलीप साहब होंगे अभिनय सम्राट पर ईमानदार जी अभिनय के आइसबर्ग हैं .उनके आकर का अंदाज़ा तब लगता है जब टकराने वाले के जहाज़ डूब लेता है . चाय वाले भैया दो पटखनी खाने  के बाद भी अंगुल कर दी तुमने ईमानदार जी के ,अब देखो वैसे एक बात कहे तुमने जाने में किया हो या अन्जाने में पर काम बहुत नेक किया .कल तक तो ईमानदार जी सोच रहे थे की चर गुनी पगार को लेकर पब्लिक कहीं उनकी ईमानदारी को कटघरे में ना खड़ा कर दे पर तुम्हारे तोते ने कटा क्या मनो सारा संकट ही काट दिया अब जब तक मीडिया चख चख करेगा तब तक तो अकाउंट में सेलरी भी आने लगेगी .पहले तो ईमानदार जी को तो सिर्फ डाउट था कि वे बने हैं दिल्ली की गद्दी के लिए पर अब तो यकीन है कि एक न एक दिन दिल्ली की गद्दी उनकी होके रहेगी क्योंकि ईमानदार जी से बड़ा नौटंकी ना अब तक तो हुआ नहीं जब होगा तब तक तो अमरबेल की तरह प्रधानमन्त्री  की कुर्सी  से लिपट चिपट चुके होंगे ईमानदार जी —तो सारे मिल के बोलो ईमानदार जी की ——-.

 

 


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