ग़ज़ल – ख़ान बदरे आलम

badrealam

बेटियाँ लाती है दामन में भरकर रहमत और बरकत की झोली

ये मासूम फूलों के साथ फिर क्यू लोग खेलते है खून की होली

मार  डालते है कभी माँ की कोख में तो कभी दहेज़ की खातिर

सरे आम  घूमते है कातिल इनके पहन कर सराफत की चोली

मागते है दुवाएं बीबी फ़ातेमा से और माँ दुर्गा से आशीर्वाद

देते है फिर क्यू ये लोग बहु बेटी को जहर की गोली

खुदा सब देखता है जमाना कितना भी छुपा ले गुन्हो को

गवाही देंगे रोम रोम खुदा के सामने बंद हो गी जुबा की बोली

दुवा है ये “आलम” की  तू कबूल  कर ले मेरे मौला

हर कोई मांगे  मुराद बेटियों की साजे हर मुफलिश की डोली

ख़ान बदरे आलम