किताबें जिन्दगी को राह दिखाती हैं- अहमद हसन

किताबें जिन्दगी को राह दिखाती हैं- अहमद हसन
                साहिल के गजल संग्रह पहला क़दम का हुआ लोकार्पण लखनउ। गोमतीनगर स्थित भारतेन्दु नाट्य अकादमी प्रेक्षागृह में विगत 27 जनवरी को मोहम्मद अली साहिल के गजल संग्रह पहला कदम का लोकार्पण प्रदेश… Read more ›

गहनतम भावाभिव्यक्ति है :`रेत का समंदर ‘ -डा. नीरज भारद्वाज

गहनतम भावाभिव्यक्ति है :`रेत का समंदर ‘ -डा. नीरज भारद्वाज
                  कविता कवि के अंतर्मन की अनुभूति होती है |काव्य में कवि भाव में नहीं बहते दिखते ,बल्कि अपने मन के राग-विराग या सौन्दर्य को शब्दों के माध्यम से कागज़ पर उकेरते… Read more ›

दामिनी की अंतिम इच्छा

दामिनी की अंतिम इच्छा
            मैं जा रही हु सबको छोड़कर ,सबकी आँखों में आंसू भिगोकर , नहीं पता था ऐसा वक्त आएगा ,इन दरिंदों के हत्थे चढ़ जाउंगी, कह देना माँ से ,मत बहाएं आंसू , तेरी दामिनी… Read more ›

शायर-ए-आजम मिर्जा ग़ालिब

शायर-ए-आजम मिर्जा ग़ालिब
                        रगों में दौड़ने फिरने के हम नहीं कायल, जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है। उनकी शेरो-शायरी की पूरी दुनिया कायल है। आम लोगों… Read more ›

क्यों करती हो वाद-विवाद

क्यों करती हो वाद-विवाद
            क्यों करती हो वाद-विवाद बैठती हो स्त्री विमर्श लेकर जबकि लुभाते हैं तुम्हें पुरुषतंत्र के सारे सौंदर्य उपमान सौंदर्य प्रसाधन, सौंदर्य सूचक संबोधन जबकि वे क्षीण करते हैं तुम्हारे स्त्रीत्व को हत्यारे हैं भीतरी… Read more ›

भरपेट भूखा

भरपेट भूखा
                वंचितों के सपने विद्रोह की छाती पर अंकुरित होने लगे अन्याय की धरती भी नहीं रोक सकी नहीं रोक सकती पैदा होने से इन सुलगते सपनों को वादी खामोश है प्रतिवादी ताकतवर… Read more ›

युद्धरत औरत

युद्धरत औरत
          सुबह सवेरे एक बनावटी मुस्कान पहने निकलती है घर से बार-बार मुखौटे बदलते थक जाती है कृत्रिम हंसी, खुश्क आंखें और खोखले मन आतंकित करते हैं तब भी विशिष्टों में नहीं रच पच पाती थकी… Read more ›

बोल की लब आजाद हैं तेरे…?

बोल की लब आजाद हैं तेरे…?
              कहावत है वक्त बुरा हो तो उंट पर बैठे इंसान को भी कुत्ता काट लेता है। कुछ ऐसा ही हुआ मुंबई की शाहीन व उसकी सहेली रेणु के साथ। शाहीन धाढा ने सोसल… Read more ›

कब निर्मल होगी गंगा…

कब निर्मल होगी गंगा…
            सोयेंगे तेरी गोद में एक दिन मर के हम दम भी तोड़ेंगे तेरा दम भर के हम, हमने तो नमाजें भी पढ़ीं हैं अक्सर गंगा तेरी पानी में वजू करके। नजीर बनारसी के ये… Read more ›

दास्तान-ए-सुविधा शुल्क ( सागर उवाच )

दास्तान-ए-सुविधा शुल्क ( सागर उवाच )
          दास्तान-ए-सुविधा शुल्क शर्मा जी को हमेशा कसक रहता कि वे सरकारी मुलाजिम न हुए। जब भी हमारे यहां उनकी आमद होती, बस एक ही रट लगाते। भाई साहब… काश! मैं भी सरकारी मुलाजिम होता। मेरे… Read more ›