भ्रष्टाचार आखिर लोग करें…. तो करें क्या…?

amit_tyagi

प्रियो भवति  दानेन प्रियवादेन चापरः

मंत्रमूलबलेनान्योयः प्रियः प्रिय एवं सः

विदुरनीति अध्याय 7

इस विश्व में कोई व्यक्ति दान देने से, कोई मधुर बोलने से, कोई यंत्र एवं औषध से प्रिय होता है। किन्तु जो वास्तव में अच्छा एवं अनुकरणीय है, वह तो आजीवन स्वयं ही प्रिय रहता है।

 

किसी पद पर स्थापित व्यक्ति की शोभा उसके पद से नही बल्कि उस पद पर रहते हुये उसके द्वारा किये गये कार्यो से होती है। कोई भी पद सुख का माध्यम नही, एक उत्तरदायित्व है। उत्तरदायित्व में सिर्फ अधिकारों का इस्तेमाल ही नही, कर्तव्यों का निर्वहन भी शामिल है। जब कर्तवयों का निर्वहन नही किया जाता, सिर्फ अधिकारों का दुरूपयोग होता है, तब घोटालों का उदय होता हैं। बड़े वित्तीय घोटालों के नाम कुछ दिनों तक मीडिया में तो आते हैं, फिर अचानक से कहॉ चले जाते हैं ? किसी को पता ही नही चलता। पिछले कुछ दशकों में बोफोर्स घोटाला, पशुपालन घोटाला, हवाला घोटाला, हर्षद मेहता कॉड, चारा घोटाला, केतन पारीख स्कैंडल, बराक मिसाइल डील स्कैंडल, तहलका कॉड, तेलगी, तेल के बदले अनाज घोटाला, ताज कॉरीडोर, कैश फार वोट ,सत्यम, मधु कोड़ा का घोटाला प्रमुख रहे। अब टू जी स्पेकटम घोटाला में ए0 राजा, ज़मीन घोटाले में येदुरप्पा, आदर्श सोसायटी घोटाले में अशोक चव्हाण एंड कंपनी, सूचना लीक करने वाले आई0 ए0 एस0 रवि इंदर समेत हमारे इर्द गिर्द ऐसे ही लोगों का जमावड़ा है, जो समाज के अपराधिक वर्ग को एक नयी दिशा देने में कामयाब हो रहे हैं ? पूर्व के घोटालों में लिप्त लोगों को क्या पर्याप्त सजा मिली, जिसके वह हकदार थे ? अब यह तो वही बात हुयी कि 10 रू चुराओ तो चोर, 100 करोड़ चुराओ तो सफल व्यवसायी। यही हमारे समाज की विडम्बना है। आज तो स्थिति यह है कि हमारी सेना भी भ्रष्टाचार से अछूती नही है। सुकना भूमि घोटाले में सेना के चार अफसर आरोपित हैं। ये चारो अफसर लेफटिनेंट जनरल स्तर के हैं।

 

कुछ और गहराई तक जायें, तो हम देखते है कि स्थिति और भी ज्यादा जटिल है। ट्रंासपेरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार 50 प्रतिशत भारतीयो को अपना काम कराने के लिए या तो रिश्वत देनी पड़ती है या अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना पड़ता है। जनता को सरकार से मिलने वाली 11 बुनियादी सुविधाओं जैसे स्वास्थय, शिक्षा, न्यायपालिका, पुलिस आदि में भ्रष्टाचार से ही 21068 करोड़ का कारोबार है। बिहार राज्य में गरीबों को दी जाने वाली 80 प्रतिशत खाघ सहायता चुरा ली जाती है। भूमाफिया और बिल्डरो का अवैध भूमि अधिग्रहण अब आम बात हो गयी है। इन सबमें कहीं न कहीं सरकारी तंत्र अवश्य लिप्त होता है। इसी क्रम में सरकारी अधिकारियों द्वारा की जाने वाली टेंडर प्रक्रिया हमेशा उनके चहेते और चुनिंदा लोगों को ही फायदा पहुॅचाती दिखती हैं। ट्रंासपेरेंसी इंटरनेशनल के ही अनुसार भ्रष्टतम देशों की सूची में 2001 में भारत 71वें स्थान पर था जो 2010 में बढ़कर 87वॉ हो गया। या यॅू कहें कि हमारा भ्रष्टाचार पिछले 10 सालों में कम होने के बजाय बढ़ा है।

यदि विजिलेंस मामलों के ऑकड़ों की बात करें,तो 2004 में सीबीआई के पास 758 एवं राज्यों में 2585 मामले आये जो 2007 तक बढकर 3178 तक पहुॅच गये। 2005 में 414 लोगों पर विभागीय कार्यवाही का आदेश हुआ, 178 पर कार्यवाही हुयी भी। वहीं 2008 में 736 लोगों पर विभागीय कार्यवाही का आदेश हुआ। 489 पर कार्यवाही हुयी। ये ऑकड़े बताते हैं कि नौकरशाही में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ ही रहा है। बड़े घोटालेबाज़ों को बचाने मे नौकरशाही का यह भ्रष्टाचार संजीवनी का कार्य कर रहा हैं। भ्रष्टाचार के साथ सबसे बड़ी विडम्बना यह भी है कि जिन संस्थाओं के द्वारा भ्रष्टाचार की जॉच की जाती है, वह स्वयं भी निष्पक्ष नही है। इनके अधिकारी या तो भ्रष्ट हैं या राजनैतिक प्रभाव में आकर कार्य करने लगते हैं। कुछ दशक पहले लोग सी0आई0डी0 को विश्वसनीय मानते थे। सी0आई0डी0 जॉच में अभियोग के जाने पर एक ‘परसेप्शन’ था कि अब अभियुक्त बख्शे नही जायेंगें। धीरे धीरे राज्य सरकारों का हस्तक्षेप बढ़ा और सी0आई0डी0 की विश्वसनीयता ख़त्म हो गयी। अब सी0 आई0 डी0 सिर्फ टीवी चैनलो पर आ रहे धारावाहिकों में ही विश्वसनीय लगती है, वास्तविकता में नही। जैसे जैसे समय बीता, लोगों द्वारा निष्पक्ष जॉच के लिए सी0बी0आई0 पर भरोसा किया जाने लगा। सी0बी0आई0 पर केंद्र सरकार का प्रभाव रहता है। कई महत्वपूर्ण प्रकरणों में सी0बी0आई0 की कार्यशैली ने उसकी विश्वसनीयता को भी प्रभावित कर दिया है। कुछ ऐसा ही हाल केंद्रिय सर्तकता आयोग का भी है। ये दोनो संस्थाए अक्सर केंद्र सरकार के राजनैतिक प्रभाव में दिखाई देती हैं। मिलता जुलता हाल प्रवर्तन निदेशालय का भी है। लोकतंत्र का यह एक नकारात्मक पक्ष है कि चूॅकि सरकार को समय समय पर जनता के पास जाना होता है, इसलिए नेताओं के पास स्वार्थी लोगों का जमावड़ा बना रहता है। यह स्वार्थी लोग सत्ता के साथ जुड़ते हैं, व्यक्ति विशेष के साथ नही। उनका राजनैतिक दलों से जुड़ाव स्वार्थसिद्वि के लिए होता है। साथ ही साथ जनता में वह लोग भी शामिल हैं, जों पूरी तरह से ईमानदार नही है। निःस्वार्थ राजनीति अब अधिकतर लोग नही करते ? मेरा कहने का तात्पर्य है कि भ्रष्टाचार की जॉच जिन संस्थाओं द्वारा हो; उनको, उनके अधीन रखा जाये, जिन्हे वापस चुनाव में न जाना हो। कम से कम वे अपनी मजबूरियों का रोना तो नही रो सकते। भारतीय संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के लिए कार्य करता है। भारत में राष्ट्रपति का पद बहुत गरिमामय है। भ्रष्टाचार की जॉच करने वाली संस्थाओं की जवाबदेही राष्ट्रपति कार्यालय से सम्बद्व होनी चाहिए।

 

भारतीय संविधान सभी नागरिको को समानता का अधिकार देता है, किन्तु भ्रष्टाचार हमारा यह अधिकार छीन लेता है। भ्रष्टाचारी इतना पैसा कमा लेता है कि वह सब कुछ खरीदने की स्थिति में आ जाता है। अब चाहे भौतिक सुविधायें हों या व्यवस्था…., पैसा सब खरीद रहा है और ईमानदारी को मुॅह चिढ़ा रहा है। ईमानदार अपना पेट नही भर पाता जबकि, भ्रष्टाचारी दावतों में लिप्त रहता है। भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा तब दर्द देता है, जब जरूरत की चीज़े इतनी महॅगी हो जाती हैं कि आम आदमी खरीद ही नही पाता है। एक तरफ माननीयों के घोटाले एवं दूसरी तरफ आम आदमी के लिए खाने के लाले, बस यहीं से एक स्वस्थ मस्तिष्क भी अपराधिक प्रवृति की ओर बढ़ने लगता है। रोज़मर्रा की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी के लिए सरकारी नीतियॉ एवं सरकारी तंत्र भी ज़िम्मेदार है। वायदा कारोबार एक अलग किस्म का भ्रष्टाचार हैं। अपनी जिम्मेदारियों एवं जवाबदहियों से बचते एफ0सी0आई0 जैसे निगमों की संवेदनहीनता एवं अव्यवस्थित वितरण प्रणाली के द्वारा खाघान्नों का बर्बाद होना तो राष्टद्रोह की श्रेणी का अपराध हैं। गरीब देश में खाघान्न की एक बोरी का सड़ना एक आदमी की हत्या करने के बराबर हैं। हजारों टन खाघान्नों को अपनी लापरवाही से खराब करने वाले अफसरों को नरसंहार का अपराधी माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी खाघान्नों का बर्बादी को संज्ञान में लेते हुये जब केंद्र सरकार को निर्देशित किया कि यदि आप खाघान्नों का सुरक्षित भंडारण नही कर सकते तो बेहतर है कि इन्हे गरीबों में बॅटवा दें। तब कृषि मंत्री शरद पवार द्वारा 11,700 टन खाघान्न के सड़ने की जानकारी लोकसभा में दी गयी। वह 2004 से लगातार कृषि मंत्री हैं     उन्होने अनाज के भ्ंाडारण के लिए क्यों कदम नही उठाये ? इस देश में यदि विशिष्ट व्यक्तियों के लिए रातों रात हैलीपैड, सड़के एवं अन्य जरूरी सामान निर्मित हो सकता है तो अनाज के भंडारण के लिए तो 9 साल एक बड़ा समय होता है। जो सेना कामनवेल्थ के लिए तीन दिन में पुल बना सकती है उसे यदि सरकार आदेशित करे तो क्या वह भ्ंाडारण के लिए गोदाम नही बना सकती ? क्या यह भ्रष्ट$आचार नही है ? कामनवेल्थ को बेटी की शादी मानने वाले लोगों को अब समझना चाहिए कि बेटी तो शादी करके अपने घर चली गयी है। घर वाले, जिन्हे यहॉ ही रहना है, वे या तो भूखे मर रहे हैं और जो कुछ खा रहे हैं। वे खा के मर रहे हैं। अधिकतर चीजें मिलावटी हैं। जब जब सरकारी तंत्र जागरूक होता है व्यवस्था के छिद्र भरते प्रतीत होते हैं। जैसे उ0 प्र0 में दूधियों के द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाला आक्सीटोसिन इंजेक्शन एवं हानिकारक रसायनो के द्वारा पके फलों के विरूद्व अभियान चलाया गया और लोगों में एक अच्छा संदेश गया। विकासशील से विकसित होते देश में महॅगाईं को कम करना संभव ही नही होता, किन्तु उपलब्घ वस्तुओं की बर्बादी रोककर काफी हद तक नियंत्रण तो हो ही सकता है। भारत में न तो संसाधनों की कमी है और न ही उनका गलत इस्तेमाल करने वाले भ्रष्टाचारियों की। महाशक्ति बनने की राह में रोड़ा ऐसे लोग ही लगाते हैं। जिस तरह महॅगाई एवं अनाज के सड़ने का मुद्दा मीडिया ने प्रचारित किया है वैसे ही भ्रष्टाचार के खिलाफ मीडिया के आवाहन ही ज्यादा कारगर एवं मारक साबित होंगें।

क्रमशः…..शेष अगले अंक में