अतीत के आइने में क्रिसमस पर्व

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yeeshu-6

हर वर्ष 25 दिसम्बर को ईसा
मसीह का जन्म दिन विश्व के दो सौ
से अधिक देशों में बड़े ही धूमधाम व
हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
इसे बड़ा दिन या क्रिसमस भी कहते हैं।
इस अवसर पर क्रिसमस ट्री सजाने,
सांटा क्लाज का स्वागत, क्रिसमस गीत
गाने, चर्च में प्रार्थना करने और फिर
केक खाने का रिवाज है।
इस पर्व को लेकर कई सवाल भी
उठते हैं, मसलन यह 25 दिसम्बर को
क्यों मनाया जाता है? ‘सांटा क्लाज’
क्रिसमस की मध्य रात्रि में क्यों आते
हैं और पहली बार कब आये? क्रिसमस
ट्री कैसे क्रिसमस पर्व से जुड़ा?
क्रिसमस का पहला कार्ड किसने
बनाया? इन सारे सवालों के उत्तर
अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन यह
तो तय है कि इस प्रथा का प्रारंभ
पश्चिमी जर्मनी से हुआ।एक प्रसिद्ध
किंवदन्ती के अनुसार बरसों पूर्व सर्दी
की एक शाम को ठंड से ठिठुरते हुए
एक लड़के ने एक गरीब लकड़हारे का
दरवाजा खटखटाया। उसने तथा
उसकी पत्नी ने लड़के को खाना
खिलाया तथा उसे गर्म बिस्तर पर
सुला दिया। लकड़हारा दंपति ने ठंड
से बचने के लिए आग का सहारा लिया
और बैठे बैठे रात गुजार दी। लकड़हारा
दंपति ने सुबह की बेला में देखा कि
वह लड़का देवदूत बन गया है और
उसके बदन पर सोने के आभूषण लदे
हुए हैं।
देवदूत ने लकड़हारा दंपति के
आदर सत्कार पर प्रसन्न होकर देवदार
की एक टहनी दी और बताया कि इसमें
प्रत्येक साल फल लगंेंगे। लकड़हारा
दंपति ने बड़े ही प्रसन्नता के साथ वह
टहनी लगा दी।
पहला क्रिसमस ट्री यह टहनी
पेड़ बनकर प्रकट हुआ जिसमें सोने के
फल लटके हुए थे तथा चांदी के
अखरोट भरे पड़े थे। देवदूत फिर प्रकट
हुए और बताया कि वह ‘शिशु ईसा‘ है
और यह पेड़ प्रत्येक साल क्रिसमस के
दिन ऐसे ही फलता रहेगा। ऐसा
विश्वास है कि प्रतिवर्ष शिशु ईसा ही
आकर पेड़ को सजा जाते हैं तथा
देवदूत अपनीे स्वामी की सहायता
करते हैं। ईसाई धर्म के लोग यह भी

मानते हैं कि पेड़ पर जो चमकीले
कागज व पन्नियां लगी है वह देवदूतों
के सुनहरे बाल हैं जो उनके स्वर्ग जाते
समय शाखाओं से उलझ कर टूट जाते
हैं। क्रिसमस 25 दिसम्बर को ही क्यों
मनाया जाता है? इस पर भी इतिहास
में कई मान्यतायें उल्लेखित हैं। ईसा
की तीसरी सदी तक क्रिसमस मनाने
के कोई संकेत नहीं मिलते।
इसके बाद रोम के पादरी
हिपोटस द्वारा दो जनवरी को ईसा
मसीह की जन्मतिथि तय की यी। इस
त्योहार की तिथि को लेकर चौथी
शताब्दी तक काफी मतभेद की स्थिति
बनी थी जो धीरे-धीरे सुधार होकर 25
दिसंबर पर स्थिर हो गया।1476 ई. में
रोमन साम्राज्य के पतन के बाद चर्च
एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरा। ईसाई
पादरियों और नेताओं ने दुनियां में नयी
मान्यताओं और परम्पराओं को बढ़ाया।
रोम से बहुत से ईसाई मिशनरियों को
प्रचार-प्रसार के लिए भेजा गया। नयी
परम्पराओं को शुरू करने में पोप जोर्जी
प्रथम (1001ई.) का महत्त्वपूर्ण योगदान
है। पोप ने क्रिसमस की पूर्व संध्या को
पारिवारिक समारोह के रूप में प्रचारित
किया। उपहारों के आदान-प्रदान के
पूर्व ‘क्रिसमस ट्री’ को सजाना, पूजा
करना, क्रिसमस भक्ति गीत गाना और
सामूहिक भोजन करना जरूरी माना
गया।प्राचीन काल में जर्मनी में 24
दिसंबर को एक त्योहार मनाया जाता
था। इस दिन ‘गार्डन ऑफ ईडन’ में
‘पैराडाईस ट्री’ या ‘ट्री ऑफ लाइफ’ के
प्रतीक के रूप में एक पेड़ लगाते थे।
यह वृक्ष देवदार या गुलमेंहदी का होता
था। यूरोप के विभिन्न गांवों में हंसी-खुशी
के विभिन्न अवसरों पर वृक्षों को सजाने
की प्राचीन परम्परा थी। 24 दिसंबर को
एक पर्व माना जाता था और उसी दिन
एक रहस्यमय नाटक भी खेला जाता
था-‘अदन का वृक्ष’ संभव है इन
विचारधाराओं में ही क्रिसमस वृक्ष को
जन्म दिया।1821 ई. में इंगलैण्ड की
महारानी ने एक क्रिसमस वृक्ष बनवाया
था। 1841 ई. में प्रिंस एल्बर्ट ने भी एक
क्रिसमस वृक्ष बनवाकर बच्चों के साथ
क्रिसमस का आनंद मनाया था। उन्होंने
ही इस वृक्ष में एक देव प्रतिमा रखने
की परम्परा को जन्म दिया। बधाई के
लिए पहला क्रिसमस कार्ड लंदन में
1844 ई. में तैयार हुआ।
बाद में यह प्रथा पूरे विश्व में फैल
गयी। जहां तक ‘सांटाक्लाज’ का संबंध
है, इसकी परम्परा क्रिसमस के साथ
काफी बाद में पड़ी। आज विश्व के
लगभग दो सौ देशों में क्रिसमस का
त्योहार बड़े उल्लास और उत्साह के
साथ मनाया जाता है।

 


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