गरीबी – कु दुलेश्वरी मांझी

*शीर्षक – ” गरीबी “*

किसने देखा है अमीरों को
गरीबों के गलियों से गुजरते हुए,
किसने देखा उन्हें बाजारों में
कभी मोल भाव करते हुए,
बिक जाती है जनाब यह ज़िंदगी
इस मोल भाव की तरजू पर,
देखते रह जाते सब यहां
इन्हें कागजों के पीछे फिरते हुए,
गुज़र रही है ज़िंदगी
ग़रीबी में घसीटते हुए।
ढल रही जिस रफ्तार से
कुछ बदलने के आस में भटकते हुए,
ख्वाहिश ज्यादा कुछ ना थी
बस इरादा था आसमां छूने चले,
अब पैर खींच रही ज़िंदगी
ग़रीबी को देखते हुए।
मासूम सी थी यह ज़िंदगी भी
जब हम दुनिया से अनजान रहे,
अब तड़पा रही यह ज़िंदगी
जाने क्यों इतने बड़े हुए।
देखो गरीबी की मारामारी
पड़ रही सभी पर भारी,
यूं तो ना गुजरती थी ज़िंदगी
अब कैसे गुजरेगी कोरोना काल से,
सारा सच कोई ना जाने
आखिर गरीब क्यों गरीब ही हैं,
बदल रही है ज़िंदगी
अमीरों के हिसाब से चलते हुए।
किसने देखा है अमीरों को
गरीबों की गलियों से गुजरते हुए ।।

नाम – डुलेश्वरी मांझी

जिला – बस्तर ( छ. ग.)
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