आत्मबोध

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“बातें,
कहकहों में, ना उड़ाओ,
सब्र करों,
ज़रा, ठहर जाओ!है,
परिंदों ने सुनाई,
ऊँची-उड़ानों-की,
असल-सच्चाई!होते, ठिकाने नहीं,
आसमां-में,
दूर-तलक, दिखती नहीं,
अपनी परछाई!

क्षणिक-गुरुर,
बुलंदी-का-भूलो,
नीची-कर-निगाहें,
पहले, खुद-को, तौलो!

ऐसा ना हो, के,
पैरों-तले, ज़मीन खिसक जाए,
तू, बिन-परों-के, हवाओं-में,

आशियाने-ढूँढ़ते, गश्त-खाये!!”_
___दुर्गेश वर्मा