प्रवाह

durgesh
 “जो शाम ना रोशन हो पाई,
छायीं, दूर-तलक तन्हाई,
रूह, उलझी-सी,
चित्त-घबराई,
पलकें-बोझिल,
आँखें-अलसाई,
दिखें, रोशनाई-से,
रंगी-तरुणाई!पर, दरख्तों-से-आती,
मद्धम-किरणें,
दिनकर-की,
हैं दर्शाती-
‘ये साँझ, मात्र,
मेरा-तुम्हारा किनारा है,
अंतिम-पथ नहीं,
जो थम जाना है’!!”_____दुर्गेश वर्मा