मैं, तन्हा-पथिक

durgesh “हूँ, तन्हा-पथिक मैं, 
 सर्द-अँधेरी-रातों-का!
 क्या रह सकते हो- 
 मेरी आँखों में, अपेक्षा-की-किरण बनकर?
क्या कर सकते हो प्रज्वलित-
मेरे बुझते-चिरागों-को?
क्या मिटा सकते हो, बूढ़े-चेहरे पर पड़ी-
उम्र-की, सिलवटों-को?
क्या दे सकते हो-
नवीन-गंतव्य-का-प्रमाचार?

हैं, सदियों रहीं, अश्कों-से-बोझिल, पलकें मेरी,
अश्रुओं-के, नमी-की-कमी, महसूस ही नहीं की कभी,
हैं, निहारते सभी, अब, क्षुद्रमति-निगाहों-से,
नहीं-पढ़ी, किसी-के-चेहरे-पर-गढ़ीं, सहानुभूति-भरे, दो-शब्द,
कल-भी-था, आज-भी-हूँ, बद्ध-जिह्व, स्तब्ध!

क्रोधावेश-में, ना-जाने, क्या-क्या विचार उठे, निर्जीव-मन-में,
पर, गढ़ा-ना, नव-इतिहास, कर, किसी-को, अंत्यकर्म-मैं,
जीवन-के, परतों-में-छिपे यथार्थ-का, बना, जीवंत-गूढ़-रहस्य हूँ अब-
‘अपनी-ही-डालें, गिरा देती हैं, पतझड़-भरे, मौसम-में,
था, सजाया कभी जिन्हें, हरी-पत्तियों, पुष्पों-से, पूर्णतः परिचित हुआ हूँ अब!’

हैं, दिन शेष…
लिए, विकर्षण-विशेष!

‘प्रसन्नता-हैं-अस्त,
अवसाद-भरे, अंधेरों-में,
हैं, पलकें-बोझिल,
अश्रुओं-के, रेलों-से!!”_______.

________दुर्गेश वर्मा