शिक्षा की चिंताजनक तस्वीर

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पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला देते हुए कहा था कि यूपी के
सभी जनप्रतिनिधियों, सरकारी अफसरों, कर्मचारियों और जजों को अपने बच्चों को
सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाना होगा। इस बड़े और ऐतिहासिक फैसले के बाद
उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में पिटीशन दायर करने वाले
अध्यापक को ही राज्य सरकार ने बर्खास्त कर दिया है।क्योकि शिव कुमार की
पीआईएल पर ही हाईकोर्ट ने इतना बड़ा फैसला दिया था . यह इस देश की बिडम्बना
है कि जब आप सही काम करते है, सही कहते है तो सिस्टम आपको काम नही करने
देता है और आपको बर्खास्त कर दिया जाता है। शिव कुमार के साथ कुछ नया नहीं
हुआ बल्कि वही हुआ जो इस देश का सिस्टम हर ईमानदार
प्रयास करने वाले आदमी के साथ करता है। लेकिन हाईकोर्ट
के इस फैसले के बड़े दूरगामी परिणाम हो सकते है क्योकि
राजतंत्र की तरह ही लोकतंत्र में भी शासक और शोषित दो वर्ग
बन गएँ है। देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद एक वर्ग का
जबर्दस्त विकास हुआ है जबकि दूसरा वर्ग पिछड़ता गया और
करोड़ों नागरिको को अपनी बुनियादी और मूलभूत जरूरतों के
लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आज भी सबके लिए बेहतर शिक्षा उपलब्ध नहीं है। देश
में खाकर ग्रामीण भारत में प्राथमिक शिक्षा के हालात बहुत ही खराब स्तिथि में है।
प्राइमरी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर इतना ज्यादा खराब है कि कोई भी थोड़ा सा साध्
ान संपन्न व्यक्ति भी अपने बच्चे को यहाँ नहीं पढ़ाना चाहता। वो किसी तरह से खुद
इंतजाम करके या कर्ज लेकर बच्चों को निजी स्कूलों में पढाना चाहता है। देश के
राजनेता, सांसद, विधायक, मंत्री अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाते,ना ही
कभी पढाना चाहते। क्योकि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर ठीक नहीं है या ये कहें
की आजादी के बाद से अब तक इसे ठीक करनें के प्रयास ठोस ढंग से नहीं किये
गए। यह भी एक सच्चाई है कि जिस दिन से देश का शासक वर्ग अपने बच्चो को
सरकारी स्कूलों में पढने को भेजेगा उसी दिन से यहाँ शिक्षा का स्तर ठीक होने
लगेगा।अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर अपना निर्णय दिया है तो एक सकारात्मक
उम्मीद बंधती है की कुछ ठीक होगा लेकिन इस फैसले पर कभी अमल हो पायेगा
इसकी उम्मीद कम ही नजर आती है क्योकि राज्य सरकार द्वारा शिव कुमार की
बर्खास्तगी के तेवर देखते हुए स्पष्ट रूप से समझ में आ रहा है की सरकारें वास्तविक
सुधार नहीं चाहती क्योकि अगर चाहती होती तो हाईकोर्ट के फैसले के एक दिन बाद
ही हाईकोर्ट में पिटीशन दायर करने वाले अध्यापक को बर्खास्त नहीं कर दिया जाता।
कुलमिलाकर राजनीति जैसी दिखती है वैसी बिलकुल नहीं होती, कम से कम
जनहितकारी तो नहीं ही होती,राजनीति का सीधा सा सिद्धांत है की पहले पूंजीपतियों
और अपने आकाओं का पेट भरों,उनके हितों में निर्णय लो इसके बाद अगर कोई
गुंजाइश बनती है तब जनता की तरफ देखों और उनके लिए काम करों। सिर्फ उत्तर
प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में प्राथमिक शिक्षा की स्तिथि बेहद चिंताजनक है।
स्वयंसेवी संगठन “प्रथम” की प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर एक रिपोर्ट के अनुसार
शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के 6 साल बाद भी प्राथमिक शिक्षा के स्तर में
कोई परिवर्तन नजर नहीं आता हैं बल्कि साल दर साल स्थिति और भी बदतर होती
जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार र्ग्रामीण विद्यालयों में कक्षा पॉच के विद्यार्थीं न तो गणित
का साधारण सा जोड़-घटाना कर सकते हैं और न ही मात्र भाषा में लिख पढ़ पाते
हैं। सर्व शिक्षा अभियान के लिए हजारों करोड़ के बजट के बावजूद देश भर में
सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षको की भारी कमी है कहीं कही तो देश में
कहीं-कहीं तो 200 बच्चों पर 1 शिक्षक ही तैनात है और कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा
विद्यालय शिक्षामित्र के सहारे ही चलता है। देश में इस समय तकरीबन 13.62 लाख
प्राथमिक विद्यालय हैं। परन्तु इनमें कुल 41 लाख शिक्षक ही तैनात हैं,जबकि देश में
अनुमानित 19.88 करोड़ बच्चे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं।
साथ ही पूरे देश में करीब 1.5 लाख विद्यालयों में 12 लाख से भी ज्यादा पद खाली
पड़े हैं। प्रतिभाशाली शिक्षकों के अभाव का ही परिणाम है कि उत्तर प्रदेश सहित कई
प्रदेशों के बच्चों के सीखने,पढ़ने व समझने के स्तर में बराबर गिरावट हो रही है।एक
तरफ देश के प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है वही दुसरी तरफ जो
शिक्षक फिलहाल विद्यालयों में तैनात है उनसे भी सरकारें कई तरह के काम करवाती
है जिससे उनका पूरा ध्यान बच्चों को पढ़ाने में नहीं रह पाता। शिक्षकों से वोटर लिस्ट
का काम, जनगणना कार्य,पल्स पोलियो दवा पिलवाना,चुनाव डयूटी करना जैसे
अनेकों काम करवाए जाते है साथ में मिड डे मील योजना के लिए मध्याह्न भोजन
कैसे बनना है,उसके लिए सब्जी लाना, गैस-तेल-लकड़ी-कंडे का इंतजाम भी
कराना पड़ता है ।ऐसे में आप उनसे शिक्षा में गुणवत्ता की उम्मीद कैसे कर सकते है।

 


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