बाल श्रम की समस्या का निदान जरूरी

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आजादी के बाद आज तक छः दशकों से भी अधिक समय बीत जाने
के बाद हमारे देश में तमाम ऐसी समस्याएं विद्यमान हैं जो न केवल हमारे
देश के विकास में बाधक हैं अपितु एक बड़ी चुनौती भी हैं। यह समस्या चाहे
बढ़ती जनसंख्या या बेरोजगारी की हो अथवा अशिक्षा एवं
गरीबी की, सभी हमारे सामने सुरसा-सा मुंह फैलाये खड़ी
हैं।
देश की ऐसी ही विकराल समस्याओं में एक गम्भीर
समस्या है ‘बाल श्रम‘ की। चाहे शहर हो या कस्बा, गांव
हो या गली, हर जगह आपको बच्चों द्वारा बाल मजदूरों
के रूप में ‘बालश्रम‘ की राष्ट्रीय समस्या अपना विराट
स्वरूप लिये नजर आयेगी। आजादी के बाद से आज तक हम हर साल 14
नवंबर को देश के प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू की जयन्ती के रूप
में बाल दिवस मनाते हैं। बच्चों के उत्थान एवं विकास हेतु बड़ी-बड़ी योजनाएं
बनाते हैं परन्तु भावी भारत के कर्णधार बच्चों की बढ़ती बालश्रम की समस्या
लगातार अपना विकराल रूप धारण करती जा रही है। देश के भावी निर्माता
बालकों के जिन हाथों में पुस्तकों और कलम की अभिरक्षा होनी चाहिए, आज
वही हाथ या तो ढाबों और होटलों में जूठे गिलास धोने में व्यस्त हैं अथवा
घर-गृहस्थी में पड़कर असमय चन्द रुपयों के लिए कूड़े-करकट के ढेर में
अपने पापी-पेट की भूख मिटाने की राह ढूंढ रहे हैं। कहने को तो हमारे देश
में सरकार ने बालकों के विकास हेतु तमाम प्रकार की योजनाएं बनाई हैं।
तमाम गैर सरकारी संस्थाएं भी बालकों के विकास हेतु सतत् कार्यशील हैं पर
फिर भी बच्चे बाल श्रम की जटिल समस्या से जूझने को मजबूर हैं।
बाल दिवस पर बच्चों के चरित्र, मानसिक, शारीरिक और सामाजिक
विकास के लिए बड़ी-बड़ी गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है, बड़े-बड़े
समारोह आयोजित किये जाते हैं परन्तु इन्हीं गोष्ठियों और समारोहों में ही
बालकों के उत्थान एवं विकास हेतु रणनीति बनाने वाले सुधारकों को जो चाय
पिलाई जाती है, वह किसी बच्चे के श्रम पर ही निर्भर होती है जो बालश्रम
की समस्या में फंसा किसी ढाबे या होटल पर दो-चार रूपयों की रोजाना
दिहाड़ी पर लोगों के जूठे गिलास धोने पर मजबूर है।
इस बच्चे का भविष्य न तो शिक्षा की परिधि में है और न ही सरकार
की उन तमाम योजनाओं की परिधि में ही आता है जो बच्चों के लिए प्रदेश
और केन्द्र की सरकारों द्वारा संचालित की जा रही हैं। यह कितनी दुःखद
स्थिति है कि जो लोग बालकों के विकास के लिए लगातार अरबों रूपयों की
योजनाएं बनाते हैं उन्हीं के घरों में अवयस्क एवं नाबालिग बच्चों को बंधुआ
नौकर बनाकर रखा जाता है। एक आंकड़े के अनुसार अपने देश में इस समय
दस लाख बच्चे ऐसे हैं जो आज बालश्रम की समस्या की गिरफ्त में फंसकर
ढाबों और होटलों पर काम करके अपनी जिंदगी व्यतीत करने पर मजबूर हैं।
हालांकि हमने बालश्रम निवारण हेतु कई कानून भी बना लिये हैं, मानवाधिकार
आयोग का भी गठन कर लिया है, फिर भी हमारे देश के भावी कर्णधार बालक
होटलों और ढाबों की शान बने हैं। बालदिवस पर बच्चों के विकास पर भाषण
देना और बालकों को अपना घरेलू नौकर बनाना हमारा नैतिक अधिकार सा
हो गया है। वाह री नैतिकता और वाह रे कानून! हमारी दोहरी मानसिकता
से देश का भविष्य असुरक्षित है और यह तभी सुदृढ़ होगा जब हम अपना
दृष्टिकोण बदलें। बालदिवस के भाषणों को अपनी यथार्थ जिंदगी का हिस्सा
बनायें।

 


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