गुरु से शिक्षा प्रदाता बने शिक्षक का दिवस

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शिक्षक दिवस है तो वातावरण में
‘गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागू
पाय‘ से ‘शिक्षक राष्ट्र निर्माता है’, ‘युग
निर्माता है’ की सुगंध होगी लेकिन इस
शब्दजाल और नारों के प्रवाह में बहने
से पहले यह समझना जरूरी है कि
क्या आज का शिक्षक गुरु है? नहीं,
हर्गिज नहीं। वैसे इसका कारण भी
शिक्षक से अधिक हम हैं।
हम आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूजा
उत्सव मनाते हैं तो 5 सितम्बर को
शिक्षक दिवस मनाते हैं। अब समाज
ही दोनांे को एक समान दर्जा नहीं
देता क्योंकि अध्यापक एक वेतनभोगी
होकर रह गया है जो अपने आका का
हर आदेश मानने के लिए बाध्य है,
शिक्षक बनना उसकी प्राथमिकता नहीं।
विश्वास न हो तो आज किसी भी युवक
से पूछो तो वह डाक्टर,
इंजीनियर,पायलट, सीए, यहां तक कि
सैनिक अफसर बताएगा लेकिन टीचर
प्रोफेसर कहने से बचेगा। हाँ, यह बात
अलग है कि जब कहीं नहीं तो यही
सही। ऐसे बोझिल परिवेश में उससे
छात्रा के सर्वांगीण विकास की अपेक्षा
करना स्वयं को धोखा देना नहीं तो
और क्या है?
शिक्षक और विद्यार्थी किसी भी राष्ट्र
की नींव के वे पत्थर हैं जिनका तन,
मन से ही नहीं, चरित्र से भी मजबूत
होना आवश्यक है। एक समय था जब
छात्र को गुरुकुल में रह कर शिक्षण के
साथ वहां की व्यवस्था से संबंधित अन्य
कार्य जैसे- जंगल से लकडि़यां लाना,
साफ-सफ़ाई, भोजन बनाना आदि भी
करते थे।
राजा- प्रजा की सन्तानें एक समान,
एक साथ रह कर शिक्षा प्राप्त करती
थीं। विश्वामित्र, वशिष्ठ, चाणक्य,
द्रोणाचार्य जैसे श्रेष्ठ गुरुओं की एक
सुदीर्घ परम्परा के दर्शन भारतीय
संस्कृति में होते हैं। तब अभिभावक
अपनी प्रिय संतान को गुरु को सौंपते
हुए कहते थे- यथेह पुरुषोऽसत् अर्थात्-
हे आचार्य! आप इस बालक को श्रेष्ठ
विद्या प्रदान कर ऐसी शिक्षा दें कि यह
पुरुष बन जाये। (पुरुष अर्थात् पालन
और पूर्णयों धातु से बना है। जिसका
अर्थ है- पालन करने वाला और पूर्ण)
इस तरह गुरु से अपेक्षा की जाती थी
कि उनके मार्गदर्शन में उनका पुत्र
यशस्वी, मनस्वी और वर्चस्वी बने, पूर्ण
पुरुष बने। मनुष्यत्व प्राप्त करे। तब
गुरु का आदर था। उसके प्रति
राजा से समाज तक श्रद्धा थी।
ऐसे में उससे शिष्य के सर्वांगींण
विकास के लिए ‘हर संभव’ प्रयासो
की अपेक्षा की जा सकती थी। तब
गुरु-शिष्य दोनांे ही प्रतिदिन
प्रार्थना करते थे-
सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु
सह वीर्यम् करवावहे तेजस्विना
वधीत मस्तु, मा विद्विषावहे।
अर्थात् हे प्रभु! हम दोनों को
एक -दूसरे की रक्षा करने की
सामर्थ्य दे। हम परस्पर मिलकर
अपनी जाति, भाषा व संस्कृति की
रक्षा करें। किसी भी शत्राु से भयभीत
न हों। हमारी शिक्षा हमें एकता के
सूत्र में बांधे, बुराइयों से मुक्त करे।
हम एक-दूसरे पर विश्वास रखें।’
आज स्थिति क्या है? दोनो के
हृदय में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास
एवं अनास्था का वातावरण है तो दूसरी
ओर आज का शिक्षक छात्रा को सभी
विषय भी नहीं पढ़ाना। आज मैथ्स
टीचर हैं, कॉमर्स टीचर हैं, साईंस का
भी एक टीचर नहीं हैं, फिजिक्स का
अलग, कमैस्ट्री का अलग, बायो का
अलग, यानी विज्ञान की हर शाखा की
जानकारी देना वाला अलग शिक्षक।
अब ऐसे माहौल में आप सारी जिम्मेवारी
उस पर डाल भी कैसे सकते हैं जब
पहले ही उसके पास जरूरत से ज्यादा
बोझ है। वह तो मात्र अपना विषय
पढ़ाने आधे से एक घंटे के लिए उस
कक्षा में आता है जहां 50 से अधिक
बच्चे हैं। वह उन्हें विषय की जानकारी
भर ही दे सकता है।
आज तो उन्हें छात्रों की विभिन्न
गतिविधियों(?) के प्रति अनजान बने
रहकर अपने विषय तक सीमित रहने
के निर्देश भी हैं। सर्वविदित है कि
अध्यापकों की उदासीनता बच्चों की
दिशाहीनता का कारण बनती है लेकिन
इस दायित्वहीनता का जिम्मेवार कौन
है? क्या छात्र या उसके अभिभावक या
वो राजनैतिक व्यवस्था जो बजट बढ़ाने
का प्रचार तो खूब करती है परंतु छात्रा
शिक्षक अनुपात तय नहीं करती।
अध्यापकों की कमी पूरा नहीं करती।
ऐसे में चरित्र निर्माण की बातंे भाषणों
तक तो बेशक प्रशंसनीय हों पर
व्यवहारिकता के धरातल पर तो उन्हें
उपहास ही माना जाएगा।
कहने वाले लाख कहते रहें कि
अध्यापक का कार्य नौकरी या व्यवसाय
नहीं, सेवा है लेकिन उनके पास इसका
कोई जवाब नहीं है कि डाक्टर, सेना,
पुलिस कौन सा काम सेवा नहीं है।
अध्यापकों के वैयक्तिक, सामाजिक,
राष्ट्रीय, राजनैतिक, सांस्कृतिक,
धार्मिक, नैतिक, व्यावसायिक
उत्तरदायित्व भी होते है। पढ़ाना उनका
कार्य है ही लेकिन बच्चें, युवा पीढी
तथा समाज में उपयुक्त चीजों की
सहायता से आदर्श एवं संस्कारों की
निर्मित करना भी उसी का दायित्व है।
बेशक भारतीय संस्कृति में गुरु को
उच्च स्थान प्राप्त था लेकिन आज
शिक्षक से छात्रा का दोस्त होने की
अपेक्षा की जाती है पर व्यवसाय बनती
शिक्षा ने छात्र को ‘क्लाइन्ट’ और शिक्षक
को ‘सर्विस प्रोवाइडर’ का रूप दे दिया
है। ट्यूशन, कोचिंग फल-फूल रहा है
क्योंकि आज शिक्षक को भी कोरा
सम्मान नहीं, चंचला लक्ष्मी
चाहिए। मोटी फीस देकर छात्र
भी समझता है कि शिक्षक उस
पर कोई एहसान नहीं कर रहा
है। साधारण अध्यापक के कार्य
एवं दायित्व बंधनों के कारण
सीमित बन गए हैं। वह परिवार
पालन व जीविका के लिए
व्यवस्था और उसके अधिकारियों
के आदेशों का पालन करने को
विवश है। स्कूल में भी शिक्षण
के अतिरिक्त अनेक कार्य है।
मिड डे मील जांचने से बांटने
तक विद्यालय के वातावरण को
शिक्षणेतर बनाते हैं। उसपर
भौतिकवाद की मृग मरीचिका ने
शिक्षण को कक्षा और टयूशन के
बीच झूला बना दिया है जिसका सीधा
असर उसकी कार्यशैली और बौद्धिक
क्षमता पर पड़ता है। अन्ततः इसकी
कीमत आर्थिक रूप से कमजोर और
ईमानदार विद्यार्थियों को चुकानी पड़ती
है।एक सत्य यह भी है कि समय के
साथ शिक्षा के तौर-तरीके भी बदले
हैं। प्रत्यक्ष संवाद रेडियों, टीवी, कैसेट
से आगे बढ़ता हुआ कम्प्यूटर, इंटरनेट
आदि उपकरणों तक ऑन लाइन हो
रहा है।
इस बदलते परिदृश्य ने
संवेदनात्मक स्पर्श के महत्व को ही
समाप्त कर दिया है। दूसरी ओर प्रबंधन
और तकनीक जैसे विषय परम्परागत
शिक्षा पर हावी हो रहे हैं, अतः परम्परागत
संस्कार और मानवीय मूल्यों के लिए
स्थान सीमित हो रहा है।
देश से अधिक विदेश का आकर्षण
युवा विद्यार्थी को शिक्षा के वास्तविक
अर्थ से दूर ले जा रहा है। ऐसे में सब
यंत्रावत है, शिक्षक से विद्यार्थी तक।
मनुष्य से व्यवस्था तक तो शिक्षक जो
एक साधारण मनुष्य ही है। वह हम
सब जैसा ही खाता, पहनता है तो
सोचता और करता भी हमारे ही जैसा
होगा। तो यह समझ से परे है कि वह
अकेला ‘राष्ट्रनिर्माता’ बनने की धुन
पर क्यों झूमेगा।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं
कि आज आदर्श शिक्षक नहीं हैं। अनेको
हैं लेकिन सरकार, समाज और स्वयं
हमने कब उसके महत्व को स्वीकारा
है। कब उसकी परेशानियों को समझा
है? हम भी तो उससे सरकारी मशीनरी
के एक पुर्जे जैसा व्यवहार करते हैं
लेकिन उपेक्षा करते हैं देवत्व वाले
व्यवहार की। जरूरत है समाज शिक्षक
के महत्व को स्वीकारे, उसका खोया
गौरव उसे लौटाये। यकीन मानिये यह
घाटे का सौदा नहीं होगा।
यदि उसमें जरा सा भी कर्तव्यबोध
है तो वह कई गुणा कर समाज को
लौटाएगा। हम सब के जीवन में जो
शिक्षक रहे हैं, उन्हें श्रद्धा से स्मरण
कर हम अपनी अगली पीढ़ी को शिक्षक
का महत्व सिखा सकते हैं। फिलहाल
गुरु से सेवाप्रदाता बनने को विवश
शिक्षक को शिक्षक दिवस की अनन्त
शुभकामनाएं।

 


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