Explainer: तो क्या यह है शिवसेना और बीजेपी के बीच विवाद की असली वजह?

शिवसेना और बीजेपी गठबंधन में एक बार फिर दरार आ गई है. इस बार वजह है महाराष्ट्र के रत्नागिरी में लगने वाला वेस्ट कोस्ट ऑइल रिफायनरी प्रोजेक्ट. भले ही दोनों पार्टियों के नेता इस मामले में एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हों, लेकिन इसके राजनीतिक मायने कुछ और ही हैं. आइए जानते हैं इस पूरे विवाद के पीछे की राजनीति को…

शिवसेना देश की सबसे बड़ी कहे जाने वाले वेस्ट कोस्ट ऑइल रिफायनरी प्रोजेक्ट के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है. इस बारे में शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे का कहना है कि हम रिफायनरी प्रोजेक्ट को कोंकण में नहीं लगने देंगे, क्योंकि इससे पर्यावरण को नुकसान होगा. यही नहीं, प्रोजेक्ट नाणार गांव के लोगों के खिलाफ है. यदि यह प्रोजेक्ट लगता है तो इससे गांव के लोगों की जमीन को बाहरी लोग खरीद लेंगे.

ठाकरे इस प्रोजेक्ट को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को साफ शब्दों में यह चेतावनी दे चुके हैं कि वो इस प्रोजेक्ट के खिलाफ है और यदि इसे सरकार लगाना चाहती है तो विदर्भ या फिर गुजरात में लगाए.

कैसा है प्रोजेक्ट…

अब प्रोजेक्ट की बात की जाए तो इस रिफायनरी की प्रस्तावित क्षमता 60 मिलियन टन प्रति वर्ष होगी. यानी कि वर्तमान में जामनगर स्थित भारत की सबसे बड़ी रिफायनरी से 70 प्रतिशत ज्यादा. फिलहाल जामनगर रिफायनरी की क्षमता 35 मिलियन टन है.

प्रोजेक्ट की लागत तीन लाख करोड़ रुपये…

इस प्रोजेक्ट की लागत तीन लाख करोड़ रुपये है. यदि यह प्रोजेक्ट पूरा होता है तो इससे एक लाख लोगों को रोजगार मिलेगा.

रिफायनरी को फिलहाल तीन पब्लिक सेक्टर प्रमोट करेंगे. ये हैं हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL), भारत पेट्रोलियम( BPCL) और इंडियन ऑइल (IOC). इन तीनों में सबसे बड़ा पार्टनर है इंडियन ऑइल. इसकी प्रोजेक्ट में 50 % हिस्सेदारी है. वहीं, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम की हिस्सेदारी 25 % है.

अप्रैल 11, 2018 को तीनों पीएसयू और सऊदी अरामको के बीच रिफायनरी और पेट्रोकेमिकल्स कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए एमओयू साइन हुआ था. इसके बाद 2015 में केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट लगाने के लिए महाराष्ट्र को चुना.

शिवसेना के आरोपों पर क्या कहना है बीजेपी का?

बीजेपी का कहना है कि इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण को नुकसान होने की बात पूरी तरह गलत है. यह एक ग्रीन प्रोजेक्ट है और इसमें एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा, जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाएगा.

बीजेपी ने यह सवाल भी उठाया कि जब महाराष्ट्र में न्यूक्लियर प्रोजेक्ट लगे थे तब तो कभी शिवसेना ने विरोध नहीं किया. फिर अब इस प्रोजेक्ट पर क्यों अडंगा लगा रहे हैं. हालांकि, इस प्रोजक्ट को पास करने के लिए बीजेपी नेता कई मोर्चों पर शिवसेना को मनाने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन शिवसेना अब भी मानी नहीं है.

तो आखिर क्या है इसके पीछे राजनीति?

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में शिवसेना के साथ दोबारा चुनाव लड़ने की बात कही थी, लेकिन शिवसेना नेताओं ने इस मुद्दे से किनारा कर लिया. हालांकि, दोनों पार्टियों के बीच कई बार विवाद हुआ, लेकिन अब तक दोनों गठबंधन में है. लेकिन कोंकण को लेकर राजनीति कुछ और ही है.

दरअसल, शिवसेना कोंकण में अच्छी पकड़ रखती है. जबकि यहां बीजेपी लंबे समय से पैर पसारने की कोशिश कर रही है. जो शिवसेना को कतई रास नहीं आ रहा है.

इसलिए बीजेपी ने रिफायनरी प्रोजेक्ट के जरिये लोगों के बीच उतरना चाहा, लेकिन शिवसेना ने विरोध कर दिया. अब आने वाले वक्त में देखना यह होगा कि इस मुद्दे को लेकर शिवसेना और बीजेपी कहां तक जाते हैं. वहीं, शिवसेना के सामने नारायण राणे भी नई चुनौती है, जो हाल ही में अपनी नई पार्टी महाराष्ट्र स्वाभिमान पार्टी के साथ कोंकण में पैर जमा रहे हैं.

क्या है कोंकण की स्थिति?

कोंकण में तीन जिले आते हैं रत्नागिरी, सिंधदुर्ग और रायगढ़ . यहां लोकसभा की दो और विधानसभा की 12 सीटें हैं. 2014 के लोकसभा में शिवसेना ने यहां से दोनों सीटें जीती थीं. जबकि विधानसभा चुनाव में 6 सीटें शिवसेना, तीन एनसीपी, एक कांग्रेस और 2 सीटें PWP को मिली थीं.