रचना – ज्योति गुप्ता

BeautyPlus_20160130085101_saveहीर बनी फिर पीर बनी

दिल राँझड़  से मिल पाये ना।

 शीतल जल की धार हुई मैं

पर प्यासा मुझको पाये ना।

 बिछुआ काटे

मोहे नागिन डसती

हाँ, जहर कोई चढ़ पाये ना।

 कि, मैं तो खुश्बू हुई मन मोहक सी

मन छू कर पवन चल पाये ना।

ठन्डे रिश्तों पर बर्फ जमी

और अगन पियू जलाये ना।

       ___ ज्योति गुप्ता