श्रद्धांजलि – कमलेश शर्मा

श्रद्धांजलि“
ए मेरे वतन के लोगों..
मैं लता…
सुनो मेरी व्यथा।
कल तक थी मैं भी..
आप सभी के बीच।
पावन..निश्छल..गदगद।
मुझे भी नेह था …ज़िंदगी से..
अपनों से.. आपसे..आपकी हर बात से।
मुझ में भी चाहत थी…गीत गाने की…
.गुनगुनाने की,हँसने की हँसाने की।
पर सब छूट गया मुझसे।
ना जाने मुझे कैसी नींद आइ..
जो कभी खुल ही ना पाई।
फिर तुम ख़ुद ही छोड़ आए मुझे..
उस मुक़ाम पर,जहाँ से मैं लौट ही ना पाई।
आज मैं नहीं हूँ..कहीं भी नहीं।
फिर भी कहना चाहती हूँ आप सब से,
जिसको नहलाया धुलाया सजाया तुमने,
वो देह थी मेरी।
देह सदा रहती कहाँ है?
रूह तो अब भी यहाँ है।
इस देह के जाने का कभी ग़म मत करना,
याद में मेरी कभी आँख भी नम मत करना।
मैं यहीं हूँ..यहीं!
ये वतन मेरा दिल ,जिगर ओर जान है।
तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे..
मेरी आवाज़ ही पहचान है।
रहूँगी साथ तुम्हारे मैं सदा याद बन कर,
दूँगी साथ तुम्हारा मैं आशीर्वाद बन कर।
तुमसे दूर कहाँ रह पाऊँगी,
तुम्हारे आस पास ही गुनगुनाऊँगी।
तुम्हारी यादों में मैं,तुम्हारी बातों में मैं।
तुम्हारी नींदों में मैं,तुम्हारे ख़्वाब में मैं।
हर साज में मैं,हर आवाज़ में मैं
संगीत में मैं,   हर गीत में मैं।
मेरा मत है ये ..*सारा सच* है ये ।
ना दिखूँ आस पास तो मत होना उदास..
जब कभी गीत मेरे गुनगुनाओगे ,
तुम मुझे अपने पास पाओगे।
तुम मुझे अपने पास पाओगे।
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द्वारा:-
कमलेश शर्मा,
जयपुर-302020