क्या सचमुच हिन्दुस्तान आज़ाद है?

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अगर सचमुच हिंदुस्तान आज़ाद है
तो क्यूँ है यहाँ हिंदी की दुर्दशा
और अंग्रेज़ी को प्रतिष्ठा प्राप्त है
भूख, भय और भ्रष्टाचार जहाँ
हर एक बस्ती में व्याप्त है
मुँह फाड़े बेरोज़गारी अशिक्षा अपराध
ऐसे देश को आज़ाद कहना हीं विडम्बना की बात है …

आज़ादी … यानि आजा दी l हमने ली नहीं, हमें बख्श दी गई l क्या हमें आज़ादी वाकई बख्शीश में मिली है ? आजादी के ६७ साल बाद भी यह प्रश्न अनुत्तरित है l वैसे तो १५ अगस्त सन १९४७ के दिन तकरीबन २०० साल से भी ज्यादा लम्बी और पीड़ादायक परतंत्रता के बाद भारत ने अंग्रेजी राज से आजादी पाई थी पर देखा जाए तो सन १२२९ ई. में हीं जब तराईन के मैदान में पृथ्वीराज की पराजय हुई थी हमारे हिंदुस्तान के स्वातंत्र्य सूर्य को परतंत्रता की आसन्न विकट संकट के ग्रहण ने डंस लिया था l १७५७ के पलासी युद्ध में तो बदहवास-सा काँपता भारत अंग्रेजों की मिल्कियत के शिकंजे तक पहुँचकर देखते हीं देखते “हिंडोस्टान” में तब्दील हो गया l आख़िर वह कौन-सी कमज़ोरी हम भारतवासियों के अन्दर रही होगी कि सदियों से हमारा भारत विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा लुटता, पिटता, शोषित होता बारम्बार दासता की श्रृंखला दर श्रृंखला में जकड़ा जाता रहा l भारतीयों की अत्यधिक भलमनसाहतता, ज़रूरत से ज्यादा भोलापन अथवा अपने देश और उसकी आजादी के प्रति कुछ अधिक हीं निश्चिन्तता, लापरवाही या कहें कि ढुलमुलापन … या फ़िर राष्ट्रप्रेम की उत्कट भावना का अभाव l इन सब में से वह कौन-सी भावना प्रबल रही होगी जिसकी वजह से हमारा देश हमेशा से हीं विदेशी आक्रमणकारियों का सबसे आसान निशाना बनता रहा l यूनान, ग्रीक, मुस्लिम, डच, पुर्तगाली, अंग्रेज एक के बाद एक विदेशी शासकों ने भारत और भारतवासियों पर करकापात करते हुए अपनी-अपनी नीतियों से इस देश का दोहन किया l सोने की चिड़ियाँ कहलाने वाले भारत और यहाँ के भोले-भाले वाशिंदों की विद्या, बुद्धि और चतुराई के चमत्कारों को बारम्बार लगातार झांसे मिलते रहे और अपनी-अपनी विलासप्रियता में लिप्त बड़े-बड़े राजा, महाराजा, बादशाह समेत डरी-सहमी भोली सामान्य जनता विदेशियों से मुँह की खाते रहे l कोई भी औने पौने यहाँ आया और बड़ी हीं शान से अपनी अपनी शक्ति आजमा कर चलता बना l किसी वक़्त व्यापार करने की इच्छा लेकर दोस्ती की निष्कपट भावना जताते हुए जो मुटठी भर अंग्रेज यहाँ आए यहाँ की समृद्धता एवं यहाँ के लोगों के भोलेपन और उनमें कहीं न कहीं मौजूद कमजोरी को भाँपते हुए देखते हीं देखते वे इस देश के मालिकान बन गए l अपना हक मारा जाता हुआ देख कर लाठी भाले चल जाना सामान्य मानवीव स्वाभाव है l मनुष्य तो मनुष्य पशुओं तक में ऐसी स्थिति में तीव्र प्रतिकिया देखने में आती है परन्तु उस वक़्त अपना सारा हक हम हिन्दुस्तानी आँखें फाड़कर चुपचाप विदेशियों के हाथों में सिमटता देखते रहे l अन्दर हीं अन्दर अत्यधिक घृणा के बावजूद भी हमने अपना मुँह बंद रखा और सलामी बजाते रहे l वैसे देखा जाय तो कुछ-कुछ इसी तरह का दस्तूर अब भी कहीं-कहीं कायम है l अभी भी राजनीति में कट्टर से कट्टर विरोधी अन्दर हीं अन्दर एक दूसरे के प्रबल दुश्मन अपने-अपने फायदे और जनता से वोट पाने के लिए मन में खंजर और मुँह पर मिसरी लिए हुए एक दूसरे के गले लग जाते हैं ! कब कौन से दो विरोधी दल अपने-अपने लाभ के लिए एकजुट हो जाएँ कहा नहीं जा सकता l तरह तरह के विलय और गठबन्धनों का न्योता राजनीतिज्ञों के लिए सामान्य नियम कायदों की तरह हैं l
कुछ शौर्यवान एवं हिम्मती प्रतापी शासकों को अगर छोड़ दिया जाए तो अंग्रेजी शासनकाल के समय भी ऐसा हीं कुछ हुआ था l अधिकतर छोटे-छोटे विलासी एवं स्वार्थी राजाओं ने अपनी स्वार्थपरता को देश से ऊपर की सर्वोच्च वरीयता पर रखते हुए कुछ न कुछ गुजाराभत्ता लेकर बगैर संघर्ष के हीं अंग्रेजों के समक्ष हथियार डालकर समझौते कर लिए थे और अपने ढुलमुलापनभरे मतलबी नीतियों की वजह से सारे देश को अंग्रेजों का गुलाम बना दिया l अगर उस वक़्त अपने अपने निहित स्वार्थ को दरकिनार कर छोटे बड़े सबों ने एकजुट होकर देश को सर्वोच्च वरीयता पर रखा होता तो विदेशियों द्वारा दमनकारी श्रृंखलाओं की पीड़ा भारत को कदाचित नहीं झेलनी पड़ती l आज भी सत्ताधारी नेताओं का संगठन अपनी स्वार्थलिप्सा सिद्ध करने हेतु अनेक असामाजिक, अनैतिक क्रियाओं को अंजाम देते हैं l खैर देशप्रेम के दीवानों ने बरसों बरस तक लगातार अपने प्राणों की आहुतियाँ देकर देश को स्वतन्त्र तो करा लिया पर दुःख की बात ये है कि आज स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता और उद्दंडता से ज्यादा नहीं रह गया है l भारत सदियों से अपना गौरव और असीम भौतिक सांस्कृतिक सम्पदाएँ खोता आया … हाँ ! वह आज भी खो रहा है .. धर्म, आध्यात्म से लेकर सामाजिक, राजनीतिक, और नैतिक चरित्र के मूल्यों को l जी हाँ ! वह पा भी रहा है … पा रहा है अवांछित अभिवर्धन अनाचार एवं भ्रष्टाचार का l उदात्त मानवीय मूल्यों का विघटन और आस्थाविहीनता के पतन से गुज़र रहे हमारे देश की डगमगाती नैया मँझधार के बीचोंबीच जा फँसने को खड़ी पड़ी है l
बहरहाल भारत अब आज़ाद है … आजाद है विदेशी सत्ता से, पराधीनता की दुर्गन्ध से … पर प्रश्न वही है, “क्या सचमुच भारत आजाद हो पाया है ?” अपनी स्वयं की कुंठित सोच और संकीर्ण विचारों से मुक्त हो पाया है ? अगर ऐसा है तो क्यूँ है अपने हीं देश में नारी अपमानित और असुरक्षित ? क्यूँ भारत की प्रतिभाओं को नहीं मिलती अपने हीं देश में कद्र ? क्यूँ डॉक्टर, इंजिनियर, साइंटिस्ट अपना देश छोड़कर अमेरिका, इंग्लैंड का रास्ता लेते हैं ? अगर सचमुच हिंदुस्तान आजाद है तो क्यूँ यहाँ हिंदी को दुर्दशा और अंग्रेज़ियत को प्रतिष्ठा प्राप्त है ? क्यूँ देश की सीमाओं के भीतर हीं आतंकवाद पोषित है ? क्यूँ आज भी देखने को मिलती है ग़रीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी, भूखमरी, कुपोषण, तरह-तरह के अपराध ?
यह सब देखते हुए तो यही लगता है कि केवल सत्ता बदली है और कुछ नहीं … सत्ताधारी तब भी तानाशाह, अपनी मनमानी करने वाला और धूर्त था और अब भी l सारी वस्तुस्थिति कमोबेश वैसी हीं है l सच तो ये है कि मानसिक रूप से हम भारतवासी अब भी अंग्रेजों के गुलाम हैं l क्यूँ ना हम सब हर साल स्वतन्त्रता के त्योहार के इस उत्सव को मनाने के पहले अपने आप को स्वतन्त्र भारत के योग्य बनाने की दिशा में संकल्प लें l हम सब भारतवासी अपनी मातृभूमि को यह वचन दें कि हम अपने-अपने स्तर से उसे सही अर्थों में स्वतन्त्र एवं आजाद साँसें देकर एक फलता-फूलता और खुशहाल वतन बनाने की दिशा में प्रतिपल दृढ प्रतिज्ञ रहेंगे l
जय हिन्द जय भारत !!!

– कंचन पाठक.
साहित्यकार, स्तम्भकार