स्त्री प्रश्न है, महज़ विचार नहीं

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सारे दरवाजे बंद कर
घनघोर अँधेरे में बैठा वो
निराश हताश था
दरारों से जीवन ने प्रवेश किया
खोल दी खिड़की, जीवन की
वो स्त्री थी
जो रिक्त हुये में भरती रही उजाले
और बदल गई अँधेरे के जीवाश्म में

(डॉ किरण मिश्रा) मेरी ये पंक्तियां स्त्री की स्थिति स्पष्ट करने के लिए काफी है । समय बहुत बदला है उसकी प्रक्रिया में बहुत बदलाव आया है लेकिन आज भी बहुतायत में स्त्री जीवाश्म में बदल रही है कारण बहुत है जैसे शिक्षा,रोजगार, संस्कार, धर्म आदि,आदि लेकिन प्रमुख करण सत्ता का है जो आज भी यूं पीठ घुमा कर खड़ी है ।

आज भी आधी आबादी की भागीदारी नहीं के बराबर सत्ता में है जबकि सत्ता पाने वाले स्त्री को एक मजबूत और जरुरी वोट बैंक मानते है और आधी आबादी के सहारे सत्ता में मजबूती से प्रवेश करते है ।

स्त्री का परिचय और इतिहास सिर्फ इतना है कि उन्हें हमेशा तब आवाज दी जाती है जब पुरषों को सत्ता पाने में उनकी जरुरत होती है चाहे देश की आजादी हो या आजादी के बाद ।
सत्ता में आने के लिए राजनैतिक दल, सत्ता की ताकत के साथ स्त्री को फिर से घर तक सिमित कर देते है।

फिर वही यातनाएं, फिर वही शर्मनाक कारगुजारियां ।ऐसी कारगुजारियों का अंत मोमबत्ती की लौ के साथ बुझ जाता है लेकिन आधी आबादी का सच जलाता है और अपनी राख से फिर जीवित हो डर, आशंका, भयावहता के बीच फिर से जलने के लिए तैयार होता है।आंधियों, दवानालों के बीच स्त्री, टूटती आस्थाओं को जोड़ती स्त्री के जीवन से जुडी पड़ताल क्या कभी पूरी होगी ये यक्ष प्रश्न है।

स्त्री से जुड़े तमाम प्रश्नों के उत्तर तलाशना जरुरी है क्योंकि स्त्री महज़ विचार नहीं प्रश्न है जिसे किसी महाज़ब, धर्म, अहंकार, राज्य, राष्ट्र, समुदायों , सरहदों पर निछावर नहीं किया जा सकता है।

मुस्लिम स्त्री विवाह और तलाक
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मुस्लिम समाज की संस्थाएं इस्लाम की मान्यताओं एवं आदर्शो पर आधारित है। इसीलिए मुसलमानों में प्रत्येक कार्य मुसलमानों के धार्मिक ग्रंथ कुरान शरीफ की मान्यताओं व आदर्शो के अनुसार ही किया जाता है एवं मुस्लिम कानून भी स्वयं कुरान शरीफ के अनुसार ही है मुस्लिम कानून यानी शरीयत के अनुसार।

मुसलमानों में ‘निकाह’ को एक शिष्ट समझौता मन जाता है, धार्मिक संस्कार नहीं। मुस्लिम निकाह में वे सब बातें मिलती है जो भारतीय संविदा या समझौते अधिनियम के अनुसार होना चाहिये।
निकाह को एक संविदा मानने वाले मुस्लिम लोगों में निकाह प्रस्ताव और स्वीकृति पर आधारित दो व्यक्तियों के बीच मर्जी से होने वाला सम्बन्ध है।

अली के अनुसार भी यही है मुस्लिम विधि के अनुसार भी यही है मौलवियों के अनुसार भी यही है
समाजशास्त्री कपाड़िया कहते है-
”इस्लाम में विवाह एक अनुबंध है जिसमे दो साथियों के हस्ताक्षर होते है। इस अनुबंध का प्रतिफल’मेहर’ अर्थात वधू को भेंट दी जाती है।
इस प्रकार मुसलमानों में विवाह दो विषम लिंगियों के बीच एक समझौता के रूप में स्वीकार किया गया है। अत: इसमे भारतीय समझौता अधिनियम की सभी आवश्यक बातें मौजूद है जैसे-
1.समझौते के लिए किसी भी पक्ष से एक प्रस्ताव रखा जाए।
2. इस प्रस्ताव के दोनों पक्षों की और से स्वतंत्र स्वीकृत प्राप्त हो।
3. समझौता करने के लिए दोनों पक्ष सक्षम हो।
4.समझौते के प्रतिफल के रूप में कुछ धन हो।

मुस्लिम निकाह की कुछ शर्ते होती है जैसे-
1.निकाह का प्रस्ताव लड़के की और से होना चाहिए और उसकी स्वीकृति लड़की की और से साथ ही दोनों की उम्र 15 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए लेकिन नाबालिग बच्चों के निकाह संरक्षक की अनुमति से हो सकते है।
2.एक मुसलमान पुरुष एक साथ चार महिलाओं से निकाह कर सकता है परंतु एक स्त्री एक समय में एक ही पुरुष से निकाह कर सकती है। पुरुष किसी भी धर्म की “किताविया”औरत से निकाह कर सकता है मूर्ति पूजक छोड़ कर
3.निश्चित मेहर, उचित मेहर, तुरंत मेहर, स्थगित मेहर में से कोई एक निकाह समझौते के प्रतिफल के रूप में लड़के को लड़की को वचन के रूप में देना होता है अगर मेहर नहीं दिया जाता या देने का वचन नहीं दिया जाता तो पति को सहवास का अधिकार नहीं मिलता।

मुस्लिम विवाह में भेद दो प्रकार के होते है-
1. निकाह
2. मुताह
जिसमे निकाह अधिक प्रचलित है और स्थायी विवाह है। यदि निकाह में कुछ नियमों का पालन नहीं किया जाता तो उस निकाह को फ़ासिद कहते है अगर उसकी कमियों को पूरा कर दिया जाता है तो उसे निकाह मान लिया जाता है।
मुतः निकाह की शर्त कुछ अलग होती है जैसे-
सहवास का समय निश्चित होता है यह समय एक दिन से एक साल तक हो सकता है। मेहर का निश्चित उल्लेख होता है।

मुस्लिम समाज में निकाह निषेद है जैसे-

माता,दादी,पुत्री,पौत्री,भाई,बहन,नानी,सास,भौजी,पुत्र वधू आदि निकटके सम्बन्धियों से निकाह नहीं कर सकता है परंतु चचेरी, फुफेरी, मौसेरी बहन से निकाह किया जा सकता है।
तलाक शुदा स्त्री से पुनः निकाह निषेद है ये तभी हो सकता है जब पुरुष किसी अन्य स्त्री से निकाह करके उसे तलाक दे या वो स्त्री जिससे निकाह किया है वो तलाक स्वेच्छा से दे तभी वो पहली स्त्री से निकाह कर सकता है जिसे उसने तलाक दिया।
गर्भवती स्त्री से निकाह निषेध होता है।
बातिल –
इद्दत की स्थिति में निकाह निषेध है और भी ऐसी कई स्थिति है जिसमे निकाह निषेध है बातिल कहलाता है जैसे बहुत समीप के रक्त सम्बन्धियों से निकाह, चार पत्नियों के होते हुए पांचवा निकाह ,पागलपन या धोखे से निकाह आदि।

फ़ासिद-
अर्थात अनियंत्रित निकाह ऐसा निकाह जिसका आधार तो ठीक है मगर औचारिक विधि के पूरा न होने से अवैध होता है। इसमें निकाह के बाद भी इन विधियों को पूरा कर लेने से निकाह वैध हो जाता है ऐसा निकाह निम्न है-
1.पांचवी पत्नी से निकाह तभी वैध होगा जब पहली चार पत्नियों में से किसी एक को तलाक दे दे।
2.बिना गवाह निकाह की बाद में गवाही लेकर वैद बनाया जा सकता है।
3.फ़ासिद निकाह कुछ परिस्थितियों में परिवर्तन करने से वैद हो जाते है।

मुस्लिम में निकाह विच्छेद

मुस्लिम में तलाक अत्यधिक सरल है परंतु यह विशेषधिकार परंपरागत तरीके से पुरुषों को ही प्राप्त है। मुस्लिम तलाक कानून के अनुसार पति जब चाहे तब पत्नी को तलाक दे सकता है ये दो प्रकार का होता है लिखित और मौखिक, लिखित तलाक नामा कहलाता है। मौखिक तलाक के कानून में तीन प्रकार है-
1. तलाकए अहसन,तलाक उल इद्दत
2. जिहर
3.इला
4.खुला
5.मुबारत

अब तक आप मुस्लिम निकाह और तलाक के सम्बन्ध में काफी कुछ जान गए होंगे तो ये भी समझ गये होंगे की मुस्लिम विवाह एक ऐसा शिष्ट समझौता है जिनमे समझौते की सारी जिम्मेदारी स्त्री की है और समझौते का सारा अधिकार पुरुष का फिर चाहे बहुपत्नी रखने का अधिकार हो या तलाक का।
अब सवाल ये उठता है की पुरे देश में तीन तलाक के बीच खड़ी मुस्लिम औरतों के वैवाहिक जीवन का फैसला कैसे हो ?
भारतीय कानून से या मौलावो की बहस से ?

मुस्लिम धर्म गुरुओं को अपने अलगाववादी अहम् को पहले छोड़ना होगा कोई भी सरहद कभी इतनी पक्की नहीं होती जिसे तोडा न जा सके धर्म की तो बिल्कुल भी नहीं, अपने को दूसरे से अलग और श्रेष्ठ समझने की परंपरा का त्याग करके अपने विलगाववाद को छोड़ कर अपनी कौम की उस आबादी के साथ न्याय करना चाहिए जो हाशिए पर पडी दम तोड़ रही है।

मुस्लिम स्त्रियों को मुख्य धारा में लाने और उनके शांतिपूर्ण जीवन यापन के लिए ये जरुरी है की तीन तलाक पर रोक लगे, पुरुषों की चार शादी पर रोक हो मतलब एक पुरुष एक ही शादी कर सकता है, और तलाक शुदा मुस्लिम स्त्री को भरण-पोषण की निश्चित व्यवस्था हो। ये हो सकता है ,जरुरी है इसमें ईमानदार कोशिश की।
ऊपर वाले ने दोनों को विभिन्न जैविक संरचना के साथ बना कर इस दुनिया में भिन्न-भिन्न भूमिकाओं को निभाने के लिये भेजा उसने किसी को किसी पर अत्याचार करने इस दुनिया में नहीं भेजा है लेकिन पुरुषों के अपने बनाये कानून के कारण स्त्री अस्मिता अभी संकट में है । समाज से लेकर शासन सत्ता ने उसे अनदेखा किया है ।
आज जरुरी है उसकी आवाज न दबाई जाए  उसे उसका अधिकार दिलाए जाए ये सिर्फ इसलिए न हो की वो वोट बैंक है बल्कि इसलिए  हो की वो इंसान है उसे भी सम्मान के साथ जीने का पूरा हक है।

मुस्लिम बहनों से इतना ही कहूंगी आप की आवाज में भले ही ताकत न हो, वो बुलंद न हो लेकिन शब्दों में ताकत होनी चाहिए अपनी दोयम दर्जे की जिंदगी से मुक्ति का पहला फ़लसफ़ा तो आप की सामूहिकता के प्रयत्नों से है । ये देश आप का है आप इसकी जिम्मेदार नागरिक है । कानून धर्मो में बटा नहीं होता आप ने दस्तक दी है दरवाजा जरूर खुलेगा और बेहतर जीने का रस्ता सुलभ होगा ।


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