कविता – पागल

 

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अचानक चलते चलते नजर
उस ओर गयी
गयी ऐसी की ठिठक कर वहीं
रह गयी
उसका बेजान चेहरा
मैले कुचैले बिखरे हुए बाल
दिखा रहे थे उसका बरसों
का हाल
तभी कानों को हंसी सुनाई दी
एक आवाज पीछे से आई थी
अरे ज़रा उस पागल को
तो देख
सुन कुछ विचलित मन हुआ
उफ़ कितना अजीब शब्द है ये
पागल
कितनी जल्दी हम किसी को
पागल करार दे देते हैं
पागल का मतलब जो अपने
होशोहवास में नहीं है
तो फिर क्या सारी दुनिया
पागल नहीं
क्या हम सब हमेशा होश
में रहते हैं
एक हाथ में डंडा उठाये
सब पर चिल्ला रही थी
कोई मर्म था शायद उसे
ही दिखा रही थी
उसके जगह जगह से फटे
कुरते को गौर से देखा
एक दर्द भरी आह निकली
अगर हम होश में रहते
तो वो पेट से न होती

***मंजुषा पांडे