मीडिया तब और अब

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(डा. नीरज भारद्वाज)  विचार किया जाए तो सूचनाओं और जानकारियों का अस्तित्व में आना तब संभव हुआ। जब व्यकित को, सूचनाओं के व्यक्तिगत संप्रेषण को सार्वजनिक करने की जरूरत महसूस हुई। इसके लिए व्यक्ति ने अनेक माध्यमों का सहारा लिया और सूचनाओं तथा जानकारियों को अनेक तरीकों से प्रस्तुत किया। जिससे कि लोगों का हित हो सके। सूचनाओं और जानकारियों के इन माध्यमों को आधुनिक संदर्भ में मीडिया के नाम से जाना जाता है। मीडिया के दो रुप हैं एक प्रिंट मीडिया और दूसरा इलेक्ट्रानिक मीडिया। मीडिया जो भी हो वह सत्य को ही प्रकाश में लाने की मूल परिकल्पना करता है। कई बार उस पर आरोप लगाए जाते हैं और कहा यह भी जाता है कि इससे जुडे अनेकानेक व्यक्ति असत्य को ही सत्य की तरह प्रस्तुत करते पाये जाते हैं। लेकिन यह बात कहां तक सत्य है। इसे तो ऐसा करने वाले व्यक्ति ही बता सकते हैं।

 

प्रिंट मीडिया के उद्भव और विकास की बात करें तो यह यूरोप में पंद्रहवीं सदी के मध्य में जब प्रिंटिंग प्रेस का प्रचलन शुरू हुआ तब से माना जा सकता है और वहीं से इसमें गति भी आयी। माना जाए तो दुनिया में आधुनिक पत्रकारिता का इतिहास लगभग यहीं से शुरू होता है। यदि वर्तमान की बात करें तो आज  भारत में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के समाचारपत्रों की लंबी सूची तैयार कि जा सकती है। यह बात सोचने की है कि किसी भी समाचारपत्र के लिए लेखन, संपादन और डिजाइन का बेहतर मिलन ही उसको सर्वश्रेष्ठ बनाता है। सोचा जाए तो भारत में हिंदी के अखबार खूब जीवंत और रूपहले हैं तथा सबसे बड़ी बात यह है कि भारत के सभी भाषाई पाठक समाचारपत्र से प्यार करते हैं और सवेरे-सवेरे समाचारपत्र पढना चाहता है। आज जब दुनिया भर में प्रिंट मीडिया आखिरी सांसें गिन रहा है। वहीं भारत में समाचारपत्र खूब फल-फूल रहे हैं और विचार किया जाए तो भारत में फिलहाल तो कागजी समाचारपत्र ही निकलेगा। लेकिन भविष्य का समाचारपत्र जाहिर है डिजिटल ही होगा। शायद कंप्यूटर स्क्रीन की बजाए मोबाइल पर पूरा अखबार हो और आगे भी यही हालत बनी रहे। लेकिन दुनिया में जो भी हो एक बात सोचने योग्य यह भी है कि भारत में ही हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के अखबार संभवत: दुनिया के सबसे अंतिम कागजी अखबार होंगे। क्योंकि भारत में अभी मुश्किल से एक करोड़ लोग वेबसाइट या मोबाइल के जरिए समाचार पढ़ते हैं। मोबाइल के साथ अभी फोंट वगैरह की कई दिक्कतें जुड़ी हैं। इंटरनेट पर डाटा का फ्लो भी उतना तेज नहीं है। इसलिए कई बार ई-समाचारपत्र कि बात कल्पना सी लगती है।

 

 

20वीं सदी में इलेक्ट्रानिक मीडिया रेडियो, टेलिविजन और इंटरनेट के आने के कारण सूचनाओं के अनेक माध्यम हो गये और सूचनाओं तथा जानकारियों को तेजी मिली। साथ ही साथ पुराना वर्गीकरण भी चलता रहा। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जब शुरू हुआ तो रेडियो से शुरुआत हुई और उसका अंत कहा होगा इसकी कल्पना करना अभी संभव नहीं है। हां एक बात जरुर है टीवी जब प्रकाश में आया तो उसके छोटे पर्दे पर एक साथ समाचार व मनोरंजन कार्यक्रम आने लगे और देखते ही देखते टीवी ने लोगों के दिलो पर राज कर लिया। भारत में इलेक्ट्रोनिक मीडिया पिछले 15-20 वर्षों में घर घर में पहुँच गया है फिर चाहे वह शहर हो या गांव। इन शहरों और कस्बों में केबिल टीवी से सैकड़ो चैनल दिखाए जाते हैं। आंकडे बताते है कि आज भारत में लगभग 80 प्रतिशत परिवारों के पास अपने टेलीविजन सेट हैं और मेट्रो शहरों में रहने वाले दो तिहाई लोगों ने अपने घरों में केबल कनेक्शन लगा रखे हैं। शुरुआती दौर में केवल फिल्मी क्षेत्रों से जुड़े गीत, संगीत और नृत्य से जुड़ी प्रतिभाओं के प्रदर्शन का माध्यम बना एवं लंबे समय तक बना रहा, इससे ऐसा लगने लगा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सिर्फ़ फिल्मी कला क्षेत्रों से जुड़ी प्रतिभाओं के प्रदर्शन के मंच तक ही सिमटकर रह गया है। लेकिन केबल के माध्यम से न केवल मनोरंजन चैनल आते हैं, बल्कि समाचार और अन्य जानकारियों के चैनल भी आते है जो हर दृष्टि से लोगों के लिए सहायक भी हैं।

वर्तमान में इंटरनेट भी लोगों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है। भारत में करीब सात करोड़ के लगभग लोग इंटरनेट का इस्तमाल करते हैं। इस सात करोड़ में से ज्यादातर मुंबई, दिल्ली और हैदराबाद जैसे कोई दस महानगरों में ही रहते हैं। वास्तव में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का यह नया माध्यम अत्यंत प्रशंसनीय और सराहनीय है, जो देश की प्रतिभाओं को प्रसिद्धि पाने और कला एवं हुनर के प्रदर्शन हेतु उचित मंच और अवसर प्रदान करने का कार्य कर रहा है। भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और उससे जुडे माध्यम हर वर्ग और समाज के हित की बात सोच कर आगे बढते रहेगे और अपना कार्य पूरी निष्ठा से करते रहेंगे ऐसी आशा और विश्वास किया जा सकता है।

 


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