सामाजिक रुढियां, नारी स्वतंत्रता में कितनी बाधक

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(मोनिका सैनी) माना गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्मा जी से हुई है और अगर हम ये कहें कि ब्रह्मा की उत्पत्ति भी किसी नारी की कोख से हुई है तो शायद कोई अतिष्योक्ति नहीं होगी ।
मनुस्मृति में लिखा है ’यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’’ अर्थात् जिस घर में नारी की पूजा होती है वहां देवता वास करते हैं लेकिन कड़वा सच यह है कि हमारा समाज ढ़ोंगी है, हम जितनी बड़ी बातें करते हैं हमारा आचरण उनसे उतना ही विपरित है । बेटी को देवी मानते हैं और उसकी भ्रूण हत्या, दहेज हत्या व बलात्कार करते हैं ।
इतिहास गवाह है कि महाभारत व रामायण के युद्ध भी नारी के कारण ही हुए हैं, पांच पतियों के रहते द्रोपदी दांव पर लगाई जाती है और एक धोबी के कहने पर गर्भवती रानी (सीता) को वनवास दिया जाता है । मुगलकालीन युग से जौहर व सती प्रथा जैसी कुरूतियां पनपी, यदि उस समय महिला को शिक्षा व युद्ध कला में पारगत किया होता तो अग्नि में जलने की जरूरत नहीं थी । हमारे समाज में रूढ़िवादिता एक प्रमुख कारण है जो हजारों वर्षाें से सामाजिक विसंगतियों अथवा अपृृष्यता नारी जाति की स्वतंत्रता में बाधा रही है । हर धर्म, जाति, समाज, अवस्था, हर जगह दोयम दर्जे की मानी गई है । स्त्रीयों को कोमल व कमजोर माना गया है । पुरूष अपने आपको बलशाली, कमाने वाला, स्त्री की रक्षा करने वाला समझता है या दर्शाता है परन्तु सच्चाई ये है कि आज भी गांवों में 60ःमहिलाऐं कृषि, पशुपालन व घरेलु कार्य देखती है । पुरूष के बराबर दिहाड़ी जाती है और पुरूष गांवों की चैपाल पर ताश के पत्ते खेलते हैं या दारू पीकर अपनी पत्नियों को पीटते हैं । साथ ही साथ महिला को आर्थिक स्वतंत्रता भी नहीं है । उसके काम को उसका अधिकार व कत्र्तव्य समझा जाता है । जबकि निर्णय लेने का अधिकार तो उसके खाना बनाते समय भी नहीं है । वहां भी उसको पति व परिवार से पूछना पड़ेगा कि आज क्या बनाऊं, ये सब रूढ़िवादिताऐं उनके दिमाग में भर दी जाती है जिनके कारण वो सिर्फ कठपुतली बनकर रह गई है।
रूढ़िवादिता का सरल सा अर्थ है, चिरकाल से चली आ रही मान्यताओं, परम्पाराओं व व्यवस्थाओं का बिना तार्किक व वैज्ञानिक अर्थ के अनुकरण करना । भारतीय समाज सदैव पुरूष प्रधान, पिृतसत्तात्मक व पारम्परिक रहा है, रूढ़िवादिता की आड़ में महिलाओं का शोषण व अत्याचार करता रहा है, इसी कारण औरत दोयम दर्जे की मानी जाती है । आजादी से पहले नारी को शिक्षा का अधिकार नहीं था । नारी को घर का सम्मान व इज्जत का आधार बनाकर अपेक्षित रखा जाता था। नारी को जन्म से ही परिवार की सेवा, पति परमेष्वर घर की लाज आदि परम्पराओं में बांध कर जीना सिखाया जाता था ।
महाकवि तुलसीदासजी ने लिखा है कि ढ़ोल, शुद्र, पशु और नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी अर्थात् इन सबाको पीटते रहना चाहिए । एक महाकवि रामचरत मानस जैसे ग्रन्थ में ये लिख सकते हैं तो साधारण इन्सान तो भ्रमित हो ही जाते हैं ।
रूढ़िवादिता के कारण विधवा पुनर्विवाह, सतीप्रथा, बालविवाह, पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों ने जन्म लिया ये सभी कुरीतियां अशिक्षा के कारण पनकी है । पुरानी मान्यताओं को धार्मिक मोड़ देकर नारी को और कमजोर बना दिया जिसमें करवा चैथ जैसे व्रत है जिसको करने से पति की उम्र बढ़ती है, ऐसा कोई व्रत पुरूषों के लिए नहीं है।
बलात्कार व दहेज जैसी विकृत व हिंसात्मक मानसिकता के कारण भ्रूण हत्या पनप रही है । बेटे के जन्म पर खुशिायां व बेटी जन्म पर अफसोस सिर्फ रूढ़िवादिता का ही प्रतीक है । मोक्ष प्राप्ति बेटे के अग्नि देने से ही होती है, इसी लालच में कन्याओं को मार दिया जाता है । आज भारत में पुरूष महिला जनसंख्या का अनुपात प्रति 1000 पुरूष के साथ 940 महिलाऐं ही है तभी आज शादी के लिए लड़कियां नहीं मिल रही है, इसके कारण भारत में एक ओर कुप्रथा जन्म ले रही है वो है महिला बहुल राज्यों से या गरीब महिला को खरीदा जाता है या अदला बदली की जाती है जिससे समाज खोखला हो रहा है । यदि अब भी रूढ़िवादिता को खत्म नहीं किया तो समाज पतन की ओर जायेगा ।
हालांकि आजादी के बाद महिला शिाक्षा पर बहुत काम हुआ है, बहुत अनुसंधान हुआ है । आज महिलाऐं कहीं भी कमतर नहीं है, हर क्षैत्र में बराबर भाग ले रही है, शिाक्षा रूढ़िवादिता को कम करती है, पारम्परिक मान्यताओं से छुटकारा दिलाती है । मुझ आज की नारी से ये कहना है कि पढ़ लिखकर आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक रूप से आत्मनिर्भर बनो तभी समानता की बात सार्थक होगी । दहेज, भ्रूण हत्या व घरेलू हिंसा का सामाजिक बहिष्कार करों। अपने अधिकरों व कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहो । पति में परमेष्वर नहीं देखे पति में हमसफर, साथी ढ़ंुढ़े तभी जिन्दगी मजे से कटेगी व नारी का जो नैसर्गिक सौन्दर्य है, प्यार, ममता, स्नेह इन सबका परिवारसमाज हर जगह खूब बिखेरे, न्यौछावर नारी शक्ति बहुत महान है, हमें ये अहसास ही नहीं है कि हम सृष्टि की जन्मदायिनि हैं । नारी में अपार शक्ति है, उन्हें जागृत करना होगा । अन्त में, मैं संजय कुमार जी की कविता के माध्यम से ये कहना चाहूंगी कि:- कोमल है कमजोर नहीं तू, शक्ति का नाम ही नारी है ।
जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है
, सतियों के नाम पर तुझे जलाया, मीरां के नाम पर जहर पिलाया,
सीता जैसी अग्नि परिक्षा आज भी जग में जारी है, कोमल है कमजोर नहीं तू …………..

मोनिका सैनी
अध्यक्ष, वनसंरक्षणएवंपर्यायवरणसमिति
सरदारशहर-331403 जिला चूरू

 


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