संस्कृति और संस्कार

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( डॉ. नीरज भारद्वाज ) मेरे देश महान् ऐसे ही नहीं है, उसमें सभी के लिए कुछ न कुछ अवश्य है। यही वो देश है जिसमें नदी को (गंगा) माता कहा जाता है, पौधे को (तुलसी) माता कहा जाता है, पशु को (गाऊ) माता कहा जाता है, देश को (भारत) माता कहा जाता है आदि। इतना ही नहीं इन सभी की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से पूजा भी की जाती है और कहा जाता है कि दया धर्म का मूल है। ऐसे कितने ही उदाहरण हमें मिल जाएंगे, जो हमारी सांस्कृतिक एकता की महानता को बताते हैं और हमें विश्व में महान् बनाने का कार्य करते हैं।

मेरे देश में पडोस क्लचर और राष्ट्रीय-सांस्कृतिक एकता का एक प्रमाण यह भी रहा है कि नवरात्रों के दिनों में लोग अपने घरों में मिट्टी से छोटे-छोटे सितारे बनाकर उन्हें रंग में रंगकर सांझा माई की प्रतिमा को बनाते और उसे सजाते तथा रोज सांय उसकी आस-पडोस की लडकियों द्वारा इक्टठे होकर पूजा करना होता। यह कार्य सरल सा लगता है। लेकिन इस कार्य को करने से पहले सभी का एकमत होना और बिना किसी डर-भय के हमारी बहन बेटी का अपने पडोस में जाना और उनके घर पर पूजा करना यह बात अपने आप में स्पष्ट करती है कि हमारी संस्कृति और हमारी सोच कितनी महान् है।

लेकिन वर्तमान संदर्भ में सभी कुछ धूमिल हो गया है न तो कोई ऐसे पूजा करता है और आज की पीढीं को तो शायद ये सभी बातें पता भी है के नहीं। इतना ही नहीं कृषि प्रधान देश होने के चलते नवरात्रों में ही लोग अपने घर में मां दुर्गा के सामने जों को एक छोटे से बरतन में उगा कर देख लेते थे कि अब मौसम गेहूं की खेती के लायक हो गया है कि नहीं। यह छोटी-छोटी बातें सुनने में आपको अजीब लगेगी। लेकिन यही सत्य है हमारी संस्कृति का। इतना ही नहीं यह सभी कुछ केवल किस्से कहानियों की चीज रह गई हैं।

एक सच्चा साहित्यकार अपने समाज की सभी बातों को अपने कथा साहित्य में जरुर उजागर करता है। लेकिन वर्तमान में साहित्य भी नए सीरे से लिखा जा रहा है और क्लचर भी दिनों दिन बदलता जा रहा है। उन कहानियों में अवैध संबंध, लिव-इन-रिलेश्नशिप, बिना शादी के बच्चा, एक पुरुष या नारी के कितने ही अलग-अलग से संबंध बनाना, ऑफिस क्लचर आदि घटनाओं को हमारे सामने उजागर किया जा रहा है।

क्या हमारी संस्कृति इतनी कमजोर है, जो इन लोगों के आगे घुटने टेकने पर मजबूर है। हमें सोचना होगा और लोगों को तथा आने वाली नई पीढीं को बताना होगा कि हम कैसे समाज में रहे हैं और निकट भविष्य में भी हम ऐसा ही समाज बनाने कि कोशिश कर रहे हैं। आपको इस काम में जी-जान एक करना होगा तभी संस्कृति और संस्कारों को बचाया जा सकता है। महान् बनने और बनाने के लिए अपने अंदर परहित की भावना को पैदा करना होता है, जो हमारे पूर्वजों ने हमें दी है। यही हमारी संस्कृति और संस्कार हैं।