टोपी को पहचानो

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(डॉ. नीरज भारद्वाज) समाज में कई प्रकार के उतार-चढाव आते रहते हैं। इन उतार-चढाव के साथ-साथ फैशन भी लोगों तक पहुंचता रहता है। समय बदलता है तो फैशन भी बदलता है। लेकिन कई बार पुराना फैशन बाजार में आकर नई धूम मचाता है। आज भारत में एक बार फिर टोपी का फैशन या कहें कि टोपी का चलन तेजी से बढ रहा है। टोपी जाने-अनजाने लोगों के सिर पर कैसे चली आ रही है किसी की समझ में नहीं आ रहा है।
बचपन में टोपी बेचने वाले की एक कहानी सुनी थी कि एक टोपी बेचने वाला व्यापारी पेड के नीचे सो गया। जिस पेड के नीचे वह सोया था। उस पर बहुत से बंदर रहते थे। बंदरों ने व्यापारी को सोता देखकर टोपी वाली गठरी खोली और उसमें से टोपी निकालकर पहन ली और वह बंदर वापस पेड पर चढ गए। जब व्यापरी की आँख खुली तो उसकी सारी टोपी गायब थी और उन्हें बंदर पहने हुए थे। व्यापारी ने दिमाग लगाया और उसने अपनी जेब में रखी टोपी को निकाला सिर पर पहना और जैसे ही बंदरों की नजर उस व्यापारी पर पडी तो उसने अपनी टोपी सिर से उतार कर फैंक दी। फिर क्या था बंदर तो होते ही नकलची है। उन्होंने एक-एक करके सारी टोपियाँ नीचे फैंक दी और व्यापारी टोपी इक्टठी करके वापस अपने घर चला गया। उस समय बचपन में कहानी का केवल एक ही मतलब समझ आया था कि बंदर नकलची होता है। लेकिन दूसरा अर्थ टोपी का इतना बडा महत्व होता है कि वह कितना बडा परिवर्तन कर सकती है समझ नहीं सके थे। क्योंकि वर्तमान राजनीति को बदलने में टोपी ने जो कमाल किया है। उसके बारे में शायद ही किसी ने सोचा होगा।
टोपी अमूमन खादी से बनाई जाती है और आगे और पीछे से जुड़ीं हुई होती है, तथा उसका मध्य भाग फुला हुआ होता है। वास्तव में टोपी भारत के कई राज्यों में मध्यमवर्ग से लेकर उच्च वर्ग के लोग बिना किसी राजनैतिक हस्तक्षेप के इसे पहनते आए हैं। जैसे कि हिमाचल, उत्तरप्रदेश, गुजरात, बंगाल, कर्नाटक, बिहार और महाराष्ट्र में सदियों से टोपी पहनी जाती रही है।
इतना ही नहीं भारतीय नेता और राजनैतिक दल इस प्रकार की टोपी के अलग-अलग प्रारूप इस्तेमाल करते रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेजों ने भारतीय कैदियों के लिए एक विशेष प्रकार की टोपी पहनना जरूरी कर दिया था। स्वतंत्रता संग्राम के समय सुभाष चन्द्र बोस ने खाकी रंग की टोपी पहनी और अपनी सेना को भी यही पहनाई। हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता काले रंग की टोपी पहनते थे।
देश आजाद हुआ तो राजनैतिक दलों ने टोपी को और अधिक महत्व दिया जो कि आज भी प्रासंगिकता बनी हुई है। भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस ने भी टोपी को पहना, तो वहीं समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता लाल रंग की टोपी पहनते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने भी पिछले दिनों केसरी रंग की टोपी पहनना शुरु कर दिया है। आम आदमी पार्टी तो मैं आम आदमी हूँ लिखी हुई टोपी पहनते नजर आते हैं। इतना ही नहीं चुनाव के समय अलग-अलग दल के लोग अपने चुनाव चिह्न के अनुसार अलग-अलग रंग की टोपी पहने नजर आते हैं।
विचार करें तो क्या टोपी ही देश की राजनीति की दिशा निर्धारित करने पर लगी हुई है। आज यह पहचानना मुश्किल हो रहा है कि कौन सही आदमी सही टोपी पहने हुए है। दूसरा यह भी हो सकता है कि कौन किसको टोपी पहना रहा है, जनता राजनेताओं को या राजनेता टोपी बदलकर जनता को। यह बात समझ पाना शायद अभी संभव नहीं है। लेकिन वक्त आने पर टोपी का राज भी हमारे सामने होगा।