तरक्की और तकरार

neeraजिज्ञासा, हमेशा कुछ नया करने और आगे बढने की आदत ने व्यक्ति को आज कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है। आदिमानव  से  आधुनिक मानव और अब सूचना प्रौदयोगिकी का मानव अर्थात् रोबट बनाने तक की सोच हमारी नई खोज और विकास का ही परिणाम है।  हिन्दी  सिनेमा में रोबट फिल्म आते ही एक चुटकुला बना कि दर्शकों ने इस फिल्म से क्या सिखा, उत्तर मिला की रोबट भी प्यार करने लगे और  विवाह  करने की सोचने लगे। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए मस्तिष्क में अनेक सवाल उठ खडे होते हैं। मानव मस्तिष्क में एक विचार रहा  है कि  विज्ञान वरदान है या अभिशाप। सोचा जाए तो विज्ञान ने जितना हमें दिया है उससे कहीं ज्यादा ले भी लिया है। एक आविष्कार के साथ दो  नुकसान  हो ही जाते हैं, ऐसा मानना किसी हद तक गलत नहीं है। जहाँ आविष्कार के साथ सुख की बात होती है, वहीं एक समस्या विकराल रूप  लेकर खडी हो  जाती है। यदि सूचना प्रौदयोगिकी की बात करे तो व्यक्ति रोज नए प्रयोगों को देखता है और एक नए सुख का अनुभव करता है। लेकिन यह कितना घातक सिद्ध हो रहा है यह भी सोचना जरुरी है।

समय बदलता गया और धीरे-धीरे व्यक्ति के सम्प्रेषण के माध्यम भी बदलते गए। आज सूचना प्रौदयोगिकी के युग के साथ ही कितनी ही सामाजिक समस्याएँ हमारे सामने आ रही है। एक तरफ सम्प्रेषण के माध्यमों ने लोगों को जोडा है तो दूसरी ओर लोगों को नई समस्याओं में भी डाल दिया है। रेडियो, टीवी, मोबाईल, कंप्यूटर, इंटरनेट आदि ने लोगों को जोडने के साथ उसकी अंतरिक सुरक्षा को सार्वजनिक करने का काम भी किया है। व्यक्ति चाहे-अनचाहे हर समय सूचना के दायरे में बंधा रहता है।

समाचारपत्र में एक विज्ञापन देखा, जिसमें घडी में समय देखने के साथ-साथ चिप लगाकर बात करने, नेट पर कार्य करना और नई-नई सुविधाएँ बताई गई। यह विज्ञापन देखकर और पढकर बडा आश्चर्य हुआ और लगा अब तो घडी बंधना भी एक नई सोच के साथ होगा। लेकिन यहाँ एक प्रश्न उठ खडा हुआ है कि क्या विद्यार्थियों, अध्यापकों और सामान्य जन का घडी बांधना ठीक है या नहीं। क्योंकि कक्षा में अध्यापक पढाते समय कई बार विषय से हटकर उदाहरण देकर समझाने की सोचता है। लेकिन यदि वह उदाहरण कहीं किसी विद्यार्थी को अखर जाए और वह कक्षा में पढा रहे अध्यापक को ऑन लाइन कर दे तो कुछ भी बवाल हो सकता है। अब यही बात कहीं भी, किसी भी व्यक्ति और विभाग में अधिकारी और कर्मचारी कर सकता है, जिससे आंतरिक सुरक्षा तो भंग होगी ही साथ ही रोज नए बबाल होते रहेगें।

अब जरा नए विचार से सोचे कि किसी भी प्रकार की परीक्षा में यदि विद्यार्थी ऐसी घडी बाँधे बैठा है, तो वह कितनी सरलता से अपना प्रश्न पत्र हल कर सकता है, खासकर एमसीक्यू (MCQ) के प्रश्न पत्र को। अब जरा सोचो भारत के कितने विद्यालयों और कॉलेजों में कितने लोग इन सभी बातों को जानने वाले हैं और कितने लगाम लगाने में सक्षम हो सकेगें। अब विद्यालयों, कॉलेजों और दफ्तरों में भी संसद की तरह ही ऐसा साधन लगाना होगा जिससे की विद्यालय, कॉलेज और दफ्तर में आते ही सूचना तंत्र के सारे साधनों की रेंज अपने आप समाप्त हो जाए और उस समय तक बंद रहे जब तक की परीक्षा, कक्षा या अन्य कार्य पूरे न हो जाए। एक तरफ तो यह लगाम और पाबंदी लगेगी लेकिन साथ ही सुरक्षा के लिहाज से यह जरुरी भी है। वास्तव में मानव ने जितनी तरक्की की है, उससे ज्यादा समाज में तकरार भी पैदा कर दी है और लोगों को नया सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब नए विचार के साथ नया सोचेगें अभी के लिए इतना ही।

( डॉ. नीरज भारद्वाज )