फिल्मी पर्दे पर पुलिस और समाज

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 ( डॉ. नीरज भारद्वाज ) हिन्दी सिनेमा शुरूआती दौर से ही लोगों के बीच अपना स्थान बनाने में सफल रहा है। फिल्मों  के अंदर अधिकतर विषय  प्यार, राजनीति, खेल, भ्रष्टचार, सामाजिक बुराइयाँ आदि के आस-पास ही घूमते नज़र आते  हैं। सबसे अधिक प्यार-महोब्बत ही फिल्में बनती रहा  है। जो भी हो, लेकिन सिनेमा ने लोगों को अपने से जोडे रखा है  और बदलते परिवेश के साथ सिनेमा भी उसी आधार पर फिल्मों का निर्माण करता  रहा है।

बदलते समाज में लोगों का शासन व्यवस्था और हो रहे भ्रष्टाचार को देखते हुए अधिकारियों और राजनेताओं पर से  विश्वास उठता जा रहा है।  पुलिस अपना काम कानून के दायरे में आकर करती है, जिसके आधार पर उसे किसी भी बात  की तह तक जाने में लंबा समय लग जाता है और लोग  पुलिस को भी उसी नजरिये से देखते हैं। विचार किया जाए तो  पुलिस और न्याय व्यवस्था ही किसी देश का आधार होती है और उसी के बल पर एक राष्ट्र अपना विकास करता है।

फिल्में मनोरंजन के साथ-साथ पुलिस और उसके कामों पर भी प्रकाश डालती चली जाती है और विचार किया जाए तो  पुलिस को आधार बनाकर हिन्दी सिनेमा में जितनी भी फिल्में आई है, उन्होंने बाक्स ऑफिस पर कमाई के साथ-साथ  लोकप्रियता भी बटोरी है। हिन्दी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन के जीवन की पहली सफल फिल्म निर्माता-  निर्देशक प्रकाश मेहरा द्वारा बनी फिल्म जंजीर रही, इस फिल्म ने न केवल अमिताभ बच्चन को सुपर स्टार बनाया,  बल्कि उसके बाद आज तक उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा है। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन (विजय) एक ईमानदार  पुलिस अफ़सर है| विजय को अपराध और अपराधियों से सख़्त नफ़रत है| शेरखान (प्राण) विजय के इलाक़े मे शराब और  जुआ का ग़ैरक़ानूनी काम करता है| दोनों में घमासान होता है पर विजय की बहादुरी देखकर शेरखान उससे दोस्ती कर लेता है और अपने ग़ैरक़ानूनी काम भी बंद कर देता है| विजय ज़हरीली शराब के कारोबारी और अंडरवर्ल्ड सरगना तेजा (अजीत) को पकड़ता है। फिल्म में एक पुलिस वाले के कामों को दिखाया गया है। इसी फिल्म से अमिताभ बच्चन के नाम के साथ “एंग्री यंग मैन” भी जुड़ गया। फिल्म अपने जमाने में खूब लोकप्रिय रही है।

सन् 1975 में बनी यश चोपड़ा निर्मित दीवार हिन्दी सिनेमा की सबसे सफ़लतम फिल्मों में से है। फिल्म अमिताभ बच्चन (विजय) और शशि कपूर (रवि) स्टारर है। कहा जाता है की इस फिल्म की कहानी अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान के जीवन पर आधारित है और अमिताभ बच्चन ने यही किरदार निभाया है। फिल्म की कहानी है दो भाईयों की। एक जुर्म की दुनिया में (अमिताभ बच्चन) चला जाता है तो दूसरा पुलिस इंसपेक्टर (शशि कपूर) बन जाता है। कानून और इमानदारी के रास्ते पर चलते हुए पुलिस इंसपेक्टर अपने भाई पर गोली चलाते हुए भी नहीं हिचकता है, जिसमें उसके भाई की जान चली जाती है। फिल्म में इसी काम के चलते हुए पुलिस इंसपेक्टर को पदक लेते हुए दिखाया गया है। फिल्म का संवाद भी लोगों के बीच लोकप्रिय रहा फिल्म में “मैं आज भी फैंके हुए पैसे नहीं उठाता”,  “ये चाबी अपनी जेब मैं रख ले पीटर, अब ये ताला मैं तेरी जेब से चाबी निकाल कर ही खोलूँगा” आदि को लोगों ने पसंद किया है।

 

सन् 1977 में मनमोहन देसाई द्वारा निर्देशित परवरिश फिल्म बनी। फिल्म की कहानी ही पुलिस वाले के जीवन से शुरु होती है। डी.एस.पी. शमशेर सिंह (शम्मी कपूर) अपराधी मंगल सिंह को पकड़ता है। मंगल की पत्नी गर्भवती है और बेटे को जन्म देते ही उसकी मृत्यु हो जाती है| शमशेर मंगल के बेटे अमित (अमिताभ बच्चन)  को गोद ले लेता है और उसे अपने बेटे किशन (विनोद खन्ना) की तरह पालता है। फिल्म में दिखाया गया है कि एक पुलिस वाले का बेटा जुर्म की दुनिया में चला जाता है, तो अच्छी परवरिश के चलते एक अपराधी का बालक पुलिस इंसपेक्टर बन जाता है और फर्ज के लिए रिश्ते नातों को नहीं देखता है।

 

आधुनिक दौर के सिनेमा की बात करें तो इसमें भी पुलिसवालों के जीवन पर बनी फिल्में लोकप्रिय रही है। सन् 2003 में निर्देशक प्रकाश झा द्वारा बनी फिल्म गंगाजल एक ईमानदार पुलिसवाले का भ्रष्ट व्यवस्था के साथ संघर्ष की कहानी है। इस फिल्म की कहानी 1979-80 में बिहार के भागलपुर में घटित एक सत्य घटना ‘आंखफोड़वा कांड’ से प्रेरित है।  फिल्म में पुलिस अधीक्षक अमित कुमार (अजय देवगन) का तबादला बिहार के एक जिले तेज़पुर में होता है।  अमित अपनी पत्नी अनुराधा (ग्रेसी सिंह) के साथ तेज़पुर आ जाता है। यहाँ आकर अमित का सामना शहर में व्यापक रूप से पसरे भ्रष्टाचार से होता है, जिसमें नेताओं के साथ पुलिसवाले भी लिप्त हैं। पुलिसवाला किसी की परवाह न करते हुए अपराध को खत्म करता दिखाया गया है।

 

सन् 2010 में रिलिज हुई फिल्म दबंग में चुलबुल पांडे (सलमान खान) एक पुलिस इंसपेक्टर है जो गुंडों को लूटता है। अपने आपको वह रॉबिनहुड पांडे कहता है। चुलबुल अपनी माँ (डिम्पल कपाड़िया) को बेहद चाहता है, लेकिन अपने सौतेले पिता (विनोद खन्ना) और सौतेले भाई माखनसिंह (अरबाज खान) से चिढ़ता है। रोजा (सोनाक्षी सिन्हा) पर चुलबुल का दिल आ जाता है। छेदी सिंह (सोनू सूद) एक स्थानीय नेता है जो चुलबुल को पसंद नहीं करता। माँ की मौत के बाद चुलबुल के अपने सौतेले भाई और पिता से संबंध खराब हो जाते हैं और इसका लाभ छेदी उठाता है। फिल्म की कहानी में इतनी जान नहीं है लेकिन पुलिस वाले के जीवन से जुडे होने कारण फिल्म ने लोकप्रियता तो बटोरी साथ ही दबंग-2 भी बनकर रिलिज हो गई।

सन् 2011 में सिंघम फिल्म रिलिज हुई। इस फिल्म में भी पुलिसवाले की दमदार भूमिका को दिखाया गया है। फिल्म ने बाक्स ऑफिस पर कमाई तो की ही साथ ही सिघंम का दूसरा भाग भी रिलिज हुआ। पुलिस को आधार बनाकर बनी फिल्म राउडी राठौर ने भी बाक्स ऑफिस पर कमाई के साथ-साथ लोगों का मनोरंजन भी किया।

इस दृष्टि से हम जाने तो हिन्दी सिनेमा में भारत के अलग-अलग राज्यों की पुलिस और पुलिसवालों के जीवन को लेकर कितनी ही फिल्में बनाई गई है। यहाँ सभी पर चर्चा करना संभव नहीं था। लेकिन जिस पर भी चर्चा हुई उससे एक बात तो निकल कर आई है कि पुलिस को चाहे लोग कितना ही बदनाम करें। लेकिन पुलिसवाले करते हमारी रक्षा ही हैं, फिल्मों में पुलिस वालो की ईमानदारी हमें बहुत कुछ सीखाती है। वह इंसाफ करते दिखाई देते हैं और लोगों के बीच लोकप्रिय होने के साथ-साथ जनता का भरोसा भी जुटाते हैं। उनकी जान बचाते हैं। राज्य में सुशासन लेकर आते हैं।

वास्तव में पुलिस हमारी रक्षा करने के साथ-साथ देश के विकास में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अपनी बड़ी भूमिका अदा करती है। जब हम सिनेमा में उन्हें इतना चाहतें हैं, तो वास्तविक जीवन में भी हमें उनका सहयोग करना चाहिए। यही हमारा कर्तव्य भी है।