फिल्म अछूत कन्याः एक अध्ययन

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डॉ. नीरज भारद्वाज (हंसराज कॉलेज, दि.वि.वि.) हिन्दी सिनेमा का जन्म सन् 1913 में दादा साहेब फालके  द्वारा बनायी फिल्म ‘राजा हरिश्चंद’ से माना जाता है। यह हिन्दी सिनेमा की पहली फिल्म थी। यह एक मूक फिल्म थी और सिनेमा का प्रारंभिक दौर मूक फिल्मों का ही था। भारत में फिल्मों का पदार्पण अपने कठिन दौर से होकर गुजरा है। अपने आरंभिक काल में फिल्में चाहे मूक थी। लेकिन भारतीय पृष्ठभूमि पर हिरोइन की तलाश करना बडा ही कठिन काम था, क्योंकि उससे पहले रंगमंच की दुनिया थी और उस पर नारी की भूमिका पुरुष ही करते थे। अब ऐसे माहौल में भारतीय महिलाओं को फिल्मों में लेकर आना अपने में एक बडा काम था। इस बात का प्रमाण हमें हमारी पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद’ से मिल जाता है, जिसमें दादा साहेब फालके तारामती के रोल के लिए  वेश्याओं के पास गए। लेकिन उन्हे वहाँ ‘ना’ सुनने को मिला। इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि उस समय फिल्मों में काम करने के लिए महिलाओं अर्थात् नायिका को ढूंढना अपने आप में बडा काम था। हमारे देश का सामाजिक दायरा इन सभी बातों की इजाजत नहीं देता था। समय बदला तो लोगों की सोच का दायरा बढा और दादा साहेब को उसी साल अपनी फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ में पार्वती के रोल के लिए मिली कमला बाई। घरेलू हालात से परेशान। पैसे के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार। जो भी हो ‘राजा हरिश्चंद’ फिल्म से ही से शुरु होता है, भारतीय सिनेमा का प्रथम चरण। समयानुसार दिन-प्रतिदिन बढता हिन्दी सिनेमा का ग्राफ बढता ही गया है और उसने पीछे मुडकर नहीं देखा है।

भारतीय सिनेमा की मूक फिल्मों के जमाने में लोग चलती-फिरती तस्वीरों को देखने जाते थे। फिल्म में कौन काम कर रहा है अर्थात् नायक-नायिका कौन है, इसके प्रति लोगों का विशेष आकर्षण नहीं था। कलाकारों अर्थात् नायक-नायिका की लोकप्रियता तो तब बढ़ी, जब फिल्में बोलने लगीं। विचार करें तो हम पाते हैं कि प्रारंभ में धार्मिक फिल्में ही ज्यादा बनती थीं। भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र ’ भी धार्मिक फिल्म थी। उस समय की कुछ प्रमुख अवाक धार्मिक फिल्में थीं फालके फिल्म कंपनी की- राजा हरिश्चंद्र, भस्मासुर मोहनी, सत्यवान-सावित्री और लंका दहन, हिंदुस्तान फिल्म कंपनी की –कृष्ण जन्म, कालिया मर्दन, बालि-सुग्रीव, नल-दमयंती, परशुराम, दक्ष प्रजापति, सत्यभामा विवाह, द्रौपदी वस्त्रहरण, जरासंध वध, शिशुपाल वध, लव-कुश, सती महानंदा और सेतुबंधन, महाराष्ट्र फिल्म कंपनी की- वत्सला हरण, गज गौरी, कृष्णावतार, सती पद्मिनी, सावित्री, मुरलीवाला तथा लंका, प्रभात फिल्म कंपनी की-गोपालकृष्ण। इसके अलावा कुछ और भी प्रयास हुए, जो सिनेमा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रहे हैं।

मूक फिल्मों का दौर 1930 तक चलता रहा, क्योंकि सन् 1931 में सवाक् फिल्मों अर्थात् बोलती फिल्मों का चलन शुरु हुआ और इसकी शरुआत हुई अर्देशीर इरानी की फिल्म आलम आरा से हिन्दी सिनेमा की यह पहली बोलती फिल्म है। आलम आरा का प्रथम प्रदर्शन मुंबई (तब बंबई) के मैजेस्टिक सिनेमा में 14 मार्च 1931 को हुआ था। इस पहली सवाक् फिल्म ने खूब लोकप्रियता बटोरी। आलम आरा एक राजकुमार और बंजारन लड़की की प्रेम कहानी है। फिल्म की कहानी काल्पनिक, ऐतिहासिक परिवेश को समेटे हुए है। माना यह जाता है कि यह फिल्म जोसफ डेविड द्वारा लिखित एक पारसी नाटक पर आधारित है। आलम आरा ने सवाक् फिल्म होने के साथ-साथ भारतीय फिल्मों में फिल्मी संगीत की नींव भी रखी। इस फ़िल्म में कुल सात गाने थे, जिनमें से कुछ गाने उस ज़माने में बेहद लोकप्रिय भी हुए थे। लेकिन दुखःद बात यह है कि ‘आलम आरा’ के गाने ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर उतारे नहीं गये, और आज इस फ़िल्म का कोई भी प्रिण्ट उपलब्ध नहीं है। इस तरह से ‘आलम आरा’ के गीतों की मूल धुने लुप्त हो गई हैं। वज़ीर मोहम्मद ख़ान की आवाज़ में दे दे ख़ुदा के नाम पे प्यारे ताक़त है गर देने की, चाहे अगर तो माँग ले उससे, हिम्मत हो गर लेने की  गीत को पहला फ़िल्मी गाना माना जाता है।

 

सन् 1930 के दशक और उसके कुछ समय बाद तक प्रभात, न्यू थिएटर्स और बॉम्बे टॉकीज ने हिन्दी सिनेमा और उससे जुडे लोगों के दिलों पर राज किया। सन् 1936 में अछूत कन्या बॉम्बे टाकीज के बैनर तले बनी एक प्रसिद्ध फिल्म है। अपने जमाने में लोकप्रिय रहे बॉम्बे टाकीज को शोहरत की बुलंदियों तक लाने में ‘अछूत कन्या’  फिल्म महत्वपूर्ण रही है। सामाजिक विसंगतियों पर चोट करने वाली यह फिल्म बरसों पुरानी होकर भी प्रासंगिक है और दिल को छू जाने वाली है। फिल्म का संवाद और अभिनय देखते ही बनता है। इतना ही नहीं इस फिल्म को सरस्वती देवी के गानों से भी ख्याति मिली। फिल्म के पहले ही दृश्य में किसी दलित युवती की समृति में स्थापित मंदिर का होना और फिल्म में दिखाया जाना अपने आप में प्रथम प्रयास कहा जा सकता है। जो उस समय के समाज की विसंगतियों को तोडता दिखाई पडता है। फिल्म फ्लैशबेक के माध्यम से आगे बढती हुई दिखाई गई है।

 

यह फिल्म भारतीय समाज में फैले जात-पात और छूआ-छूत जैसे विचारों को उजागर करती है। यह फिल्म महत्वपूर्ण इसलिए भी है, क्योंकि इसका निर्माण आजादी के तकरीबन दस साल पहले हुआ था। विचार करें तो उस समय एक तरफ तो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में लोग एकजुट होकर लड रहे थे। लेकिन सामाजिक दृष्टि से वह जात-पात के लिए भी लड रहे थे। जिसे फिल्म निर्माता ने बडे ही ढंग से उजागर किया है। यह फिल्म हमें बताती है कि भारत में उस समय के ग्रामीण लोगों का रहन-सहन कैसा था और सामाजिक पृष्ठभूमि कैसी थी। फिल्म में ग्रामीण परिवेश होने के साथ ही कुछेक पात्रों द्वारा भाषा भी बिलकुल देहाती ही सुनाई पडती है। यह फिल्म अपने अंदर बहुत सारे विषय बिन्दुओं को समेटे हुए दिखाई देती है, जैसेः- प्रेम और प्रेम में भोलापन, मित्रता, सामाज, छूआछूत, जात-पात का भेद, पंचायती राज व्यवस्था, आपसी प्रतिस्पर्धा आदि।

 

फिल्म में अभिनय करने वाले कलाकारों की बात करें तो इस फिल्म में अभिनेत्री देविका रानी (हिमांशु राय की पत्नी, जो बाम्बे टॉकीज के मालिक थे) कस्तुरी की भूमिका में हैं। देविका रानी को भारतीय सिनेमा की अग्रणी नायिकाओं में माना जाता है। फिल्म के अभिनेता अशोक कुमार हैं। प्रेम, सामाजिक असमानता, जातिवाद आदि विषयों को अपने में समेटे यह फिल्म भारतीय सिनेमा में गुणवत्ता की मिसाल रही है। ऊंचे जाति के युवा अर्थात् ब्राह्मण युवक (प्रताप) द्वारा दलित युवती (कस्तुरी) से प्रेम की कहानी है। उस जमाने में इस किस्म की फिल्में बिल्कुल नहीं बनती थी। विचार करें तो हम पाते हैं कि उस समय सामाजिक विसंगतियों के ऊपर गंभीर व आवश्यक विमर्श शुरु हो गया था। किसी हद तक कहा जा सकता है कि यह फिल्म अपने समय से आगे थी और इसी कारण सिनेमा के सफर में यह मील का पत्थर भी साबित हुई।

 

फिल्म कि कहानी पर प्रकाश डाले तो ये फिल्म रेलवे के एक अछूत गेटकीपर दुखिया की बेटी कस्तूरी तथा गाँव के एक ब्राह्मण किराना व्यापारी मोहन के बेटे प्रताप के प्रेम प्रसंग पर केन्द्रित है। फिल्म की शुरुआत रेलवे क्रॉसिंग के दृश्य से होती है, जहाँ एक दंपत्ति कार में रेलवे क्रॉसिंग पार करने के लिए आता है। लेकिन तभी गेटकीपर फाटक बंद कर देता है। जैसा की फिल्म में दिखाया गया है और संवाद से भी पता चलता है कि उस समय रात के 12 (बारह) बजे होते हैं।

संवाद

गाडीवालाः- ऐ ऐ फाटक खोल।

गेटकीपरः- फाटक नाही खुल सकये 12:50 की गाडी आयी रही है।

गाडीवालाः- तो अभी तो 12:00 (बारह) भी नहीं बजे।

गेटकीपरः- तो यामे मेरो क्या कसूर है, साहब। एक बजे से पहले हिरगीज फाटक नहीं खोलूंगो। बारह और

एक बजे के बीच यहाँ भूत आव करे, भूत।

गाडीवालाः- अच्छा, ये ले (कुछ पैसे देते हुए)

गेटकीपरः- हरे राम। हरे राम। (करते हुए चले जाना)

 

रेलवे गेट के किनारे एक स्मारक बना हुआ है जिसमें एक स्त्री की आकृति उकेरी गई है उसके नीचे लिखा हुआ है । इसने अपनी जान दी दूसरों की जानें बचाने के लिए। तभी वहाँ एक साधु प्रकट होता है। वह बताता है कि यह स्त्री, जाति से एक अछूत थी, लेकिन कर्म से एक देवी। दंपत्ति उनसे उस स्त्री के बारे में जानकारी चाहते हैं। साधु उन्हें उस अछूत कन्या की पूरी कथा सुनाता है।

संवाद

साधुः- हाँ, इसने अपनी जान दी दूसरों की जानें बचाने के लिए।

नारी पात्रः- ये देवी थी।

साधुः- हाँ, जन्म से अछूत लेकिन कर्म से देवी, इसकी जीवन कथा एक पुण्य कथा है। इसके सुनने और

सुनाने से आत्मा को शांति मिलती है।

नारी पात्रः- शांति। तो हमें भी सुना दीजिए।

साधुः- अच्छा, मैं गुजरे हुए जमाने पर से पर्दा हटाता हूँ। ताँकि तुम खुद देखों, सुनो और अनुभव करो।

 

इस प्रकार कहानी फ्लैश बैक में चली जाती है। एक दिन मोहन (ब्राह्मण दुकानदार) को सांप काट लेता है और दुखिया (अछूत रेलवे गेट कीपर) उसके जहर को अपने मुंह से निकाल कर मोहन की जान बचाता है, इससे दुखिया और मोहन की गहरी दोस्ती हो जाती है। इनके छोटे बच्चे कस्तूरी और प्रताप साथ-साथ खेलते जवान होते हैं। लेकिन इस परिवार की दोस्ती गांव वालों को चुभती है। खास कर बाबूलाल वैद्य मोहन (ब्राह्मण) को नीचा दिखाने की जुगत में लगा रहता है, क्योंकि मोहन गांव वालों को अंग्रेजी दवाएं मुफ्त में देकर उस वैद्य के धंधे को चौपट कर देता है। इसी बात को लेकर वैद्य (बाबूलाल) और मोहन में तकरार बढती चली जाती है। दूसरी ओर मोहन और दुखिया की मित्रता दिन-प्रतिदिन बढती ही जाती है।

 

संवाद

दुखियाः- मोहन लाल जी भईया, अब तुम हमारे घर आना-जाना छोड दो। तुम ऊँच जात हो हम नीच। इस

बात से सारा गाँव तुम्हारा बैरी है गया है।

मोहनः- भईया, मेरा तुम्हारा संबंध ऊँच-नीच का नहीं है। क्या ये कभी मैं भूल सकता हूँ, तुमने अपनी जान

की परवाह न करके मेरी जान बचाई। जो तुमने मेरे लिए किया भाई-भाई के लिए नहीं कर सकता।

इस बात को सारा गाँव जानता है। दरअसल  बाबूलाल वैद्य हमारे तुम्हारे बारे में लोगों को बहका रहा

है।

दुखियाः- ये बाबूलाल तुमसे क्यूं जलता है। मुझे उसकी तरफ से बहुत खतरा है।

मोहनः- मैं जो गाँव वालो को कूनेन दे देता हूँ। तो उस बेचारे की अचूक दवाओं को कोई नहीं पूछता , बस

यही बात है।

 

इसी बीच कस्तूरी (देविका रानी) और प्रताप (अशोक कुमार) का प्यार परवान चढ़ने लगता है। इन सभी बातों को देखकर मोहन की पत्नी कल्याणी अपने बेटे प्रताप के विवाह की बात करती है। मोहन कहता है यदि कस्तूरी अछूत न होती तो उसे अपनी बहू बना लेता उनकी जोड़ी बड़ी प्यारी लगती है। प्रेम परवान चढे उससे पहले ही प्रताप की शादी किसी ब्राह्मण परिवार की लड़की से कर दी जाती है। वहीं कस्तूरी का पिता दुखिया बीमार पड़ जाता है, जब मोहन को इसकी जानकारी होती है तो वह उसे उपचार हेतु अपने घर ले आता है। बस अब क्या था बाबूलाल को मौका मिल गया और उसने ग्रामीणों को भड़काया कि मोहन ब्राह्मण होकर एक अछूत को अपने घर में ले आया है। जिससे पूरे गांव का धर्म भ्रष्ट हो गया है। सभी गाँव वाले मोहन के घर जाते हैं। मोहन  दुखिया को घर से निकालने से इंकार कर देता है। भीड़ मोहन पर हमला कर देती है और उसके घर को आग लगा देती है। दुखिया डॉक्टर बुलाने के लिए जैसे-तैसे रेलवे क्रॉसिंग आता है और लाल झंडी दिखा कर डाक गाड़ी को रोक देता है। लेकिन गाड़ी के अफसर उससे नाराज हो जाते हैं। बाद में उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है। उसकी जगह एक अन्य अछूत युवक मन्नू को नौकरी पर रख लिया जाता है। जिसकी पहले से एक शादी हो चुकी है किंतु घर जंवाई बनाने की गरज से उसकी पत्नी उसके साथ नहीं रहती है। बेघर हो चुके कस्तूरी और उसके पिता मोहन को मन्नु अपने रेलवे क्वार्टर में रहने की अनुमति दे देता है। बाद में मन्नू से कस्तूरी की शादी हो जाती है। कुछ दिनों बाद मन्नू की पूर्व पत्नी कजरी भी आ जाती है। कजरी अपनी सौतन कस्तूरी को अपने रास्ते से हटाने के लिए एक षड़यंत्र करती है, वह चाहती है कि कस्तूरी अपने प्रेमी प्रताप के पास चली जाय। वह प्रताप की पत्नी मीरा को इस षड़यंत्र में शामिल करती है। गांव के पास लगे मेले में प्रताप अपनी दुकान लगाने चला जाता है। कजरी को जब ये जानकारी होती है तो वह मीरा और कस्तूरी को मेला घूमने जाने के लिए राजी कर लेती है। और वे कस्तूरी को मेले में अकेला छोड़कर गांव वापस आ जाती है। कजरी मन्नू को बताती है कि कस्तूरी मोहन के साथ भाग गई है। मन्नु गुस्से में धारदार हथियार लेकर घर से निकलता है। उसे प्रताप और कस्तूरी बैल गाड़ी में रेलवे क्रॉसिंग की ओर आते हुए मिल जाते हैं। उन्हें देख कर मन्नू प्रताप पर टूट पड़ता है। रेल लाइन पर गुत्थम-गुत्था होने लगती है। रेलवे क्रॉसिंग पर बैल गाड़ी खड़ी रह जाती है, इसी समय डाक गाड़ी की सीटी बजती है और वह धड़धड़ाते हुए रेल क्रॉसिंग की ओर आती दिखती है। कस्तूरी बैल गाड़ी को हटाने का प्रयास करती है लेकिन सफल नहीं हो पाती है। वह कहती है रेलगाड़ी अगर इससे टकराई तो हजारों की जानें जा सकती हैं, उसे रेल गाड़ी को हर हालत में रोकना होगा। वह लाल झंडी लेकर रेल गाड़ी की ओर दौड़ती है। ड्राइवर कस्तूरी को देख, ब्रेक लगाता है लेकिन कस्तूरी रेल इंजन की चपेट में आ जाती है और उसकी दर्दनाक मौत हो जाती है।

 

 

 

सामाजिक रूढ़ियों पर चोट करती यह फिल्म अपने दौर में सफल सिद्ध हुई और इसमें अभिनय करने वाले देविका रानी तथा अशोक कुमार रोतों-रात सिनेमा की दुनिया में अपना नाम कमा गए और लोगों के दिलों पर राज कर गए। सामाजिक पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म लोगों द्वारा काफी पसंद की गई। आजादी के पूर्व छूआछूत और जात-पात जैसे मुद्दे पर फिल्म निर्माण होना इस बात का प्रमाण है कि कुछ लोग भारत की तथाकथित सनातन रूढ़ियो को तोड़ना चाहते थे और समाज में इन सभी रुढियों को तोडकर गति लाना चाहते थे। जिससे की लोगों में प्रेम बढे और उनका विकास हो सके। हालांकि हमारे समाज सुधारकों और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने इस प्रकार की सभी बुराइयों को दूर करने के अथक प्रयास किए। लेकिन समाज का एक हिस्सा इन सभी बुराइयों और रुढियों को उस समय भी नहीं तोड सका और बहुत जगह तो आज भी यह स्थिति यथा संभव बनी हुई है।

 

जैसा कि फिल्म का नाम अछूत कन्या से ही समाज में फैली छूआछूत की बुराई पर कुठाराघात नजर आता है। फिल्म का जैसा नाम है निर्माता ने फिल्म में वैसा ही दिखाने का प्रयास किया है और भारतीय समाज में पनप रही इस बुराई पर जोरदार हमला बोला है। फिल्म दर्शकों को अपने से बांधे रखती है तो एक संदेश देती भी दिखाई पडती है। फिल्म में मोहन ब्राह्मण होते हुए भी ऊँच-नीच के भेदभाव को दूर करता दिखाई देता है। लेकिन समाज के कुछ ठेकेदार इस बात का विरोध करते दिखाई पडते हैं। फिल्म अपने साधारण कलेवर में जैसा की पहले जिक्र किया जा चुका है, अपने अंदर प्रेम और प्रेम में भोलापन, मित्रता, सामाज, छूआछूत, जात-पात का भेद, पंचायती राज व्यवस्था, आपसी प्रतिस्पर्धा आदि लिए हुए है। यहाँ फिल्म के कुछ एक महत्वपूर्ण बिंदुओं पर संक्षेप में प्रकाश डाला जा रहा है।

 

प्रेम और प्रेम में भोलापनःहिन्दी सिनेमा में प्रेम सबसे ज्वलंत विषय रहा है। हिन्दी सिनेमा में प्रेम कहानियों को लेकर कितनी ही फिल्में बन चुकी हैं और कितनी ही फिल्में अभी और बनेगी कहा नहीं जा सकता। हिन्दी सिनेमा की पहली सवाक् फिल्म आलम आरा भी अपनी कहानी में प्रेम का कलेवर लिए हुए है। जहाँ तक अछूत कन्या फिल्म की बात है, इसमें प्रताप और कस्तुरी का प्रेम दिखाया गया है। उनके प्रेम में भोलापन है और दोनों ही एक दूसरे के उज्ज्वल भविष्य के बारे में सोचते हैं। फिल्म का एक संवाद देखिए। जहाँ प्रताप के विवाह से पहले कस्तुरी और प्रताप मिलते हैं।

 

प्रतापः- कस्तुरी, क्या डर गई

कस्तुरीः-  नहीं, क्या ब्याह का न्योता देने आए हो, तुम बुलाओ, न बुलाओ, मैं तो आऊंगी।

प्रतापः- बुलाने चलाने का काम माँ और बाऊजी कर रहे हैं।

कस्तुरीः- अच्छा, तो कल ससुराल जाओगे।

प्रतापः- हाँ

कस्तुरीः- जी चाहता है, मैं भी साथ चलकर बहू को देखती कैसी है?

प्रतापः- मैंने तो देखा नहीं।

कस्तुरीः- वा ने तो कहा होगा।

प्रतापः- कस्तुरी कैसा अच्छा होता अगर मेरे ब्याह के साथ-साथ तुम्हारा भी ब्याह होता।

कस्तुरीः- हो जाएगा।

प्रतापः- भगवान करे तुम्हें अच्छा वर मिले।

कस्तुरीः- राम करे तुम्हें अच्छी बहू मिले।

 

इस पूरे संवाद में प्रताप और कस्तुरी के निश्छल प्रेम को प्रदर्शित किया गया है। फिल्म में प्रताप और कस्तुरी दोनों का अभिनय देखते ही बनता है।

 

मित्रताः-  फिल्म में प्रेम के साथ-साथ मित्रता को भी दिखाया गया है। मोहन (ब्राह्मण) और दुखिया (अछूत) की मित्रता को दिखाया गया है। दोनों मित्र एक दूसरे पर जान छिडकते हैं और दोनों के बच्चे प्रताप और कस्तुरी प्रेमी होने के साथ-साथ मित्र भी दिखाई देते हैं। गाँव वाले मोहन और दुखिया की मित्रता को तोडना चाहते हैं तथा ब्राह्मण और अछूत की मित्रता को पसंद नहीं करते। बीमार दुखिया को जब मोहन अपने घर ले आता है तो गाँव वाले मोहन को मारते हैं और उसके घर में आग तक लगा देते हैं। मोहन और दुखिया की मित्रता का एक संवाद इस प्रकार है।

 

दुखियाः- मोहन लाल जी भईया, अब तुम हमारे घर आना-जाना छोड दो। तुम ऊँच जात हो हम नीच। इस

बात से सारा गाँव तुम्हारा बैरी है गया है।

मोहनः- भईया, मेरा तुम्हारा संबंध ऊँच-नीच का नहीं है। क्या ये कभी मैं भूल सकता हूँ, तुमने अपनी जान

की परवाह न करके मेरी जान बचाई। जो तुमने मेरे लिए किया भाई-भाई के लिए नहीं कर सकता।

इस बात को सारा गाँव जानता है। दरअसल  बाबूलाल वैद्य हमारे तुम्हारे बारे में लोगों को बहका रहा

है।

दुखियाः- ये बाबूलाल तुमसे क्यूं जलता है। मुझे उसकी तरफ से बहुत खतरा है।

मोहनः- मैं जो गाँव वालो को कूनेन दे देता हूँ। तो उस बेचारे की अचूक दवाओं को कोई नहीं पूछता , बस

यही बात है।

 

समाजःअछूत कन्या फिल्म में भारतीय ग्रामीण परिवेश को उजागर किया गया है। उसकी पृष्ठभूमि में लोगों का रहन-सहन, खान-पान, बोलचाल आदि को दिखाया गया है। फिल्म में खेत खलियान, बैलगाडी, पंचायत राज व्यावस्था, छूआछूत आदि पर ज्यादा फोकस किया गया है। फिल्म में बुखार की दवा देने पर समाज सेवा करने की बात को भी दिखाया गया है। गाँव में बुखार की दवा देने पर बाबूलाल वैद्य और मोहन के बीच अंतर विरोध अपने आप ही पैदा हो जाता है। एक तरफ तो मोहन अपनी दुकान पर लोगों को फ्री में कूनेन की गोलियाँ देता है और लोग उसे खाकर अच्छे हो जाते हैं, तो दूसरी और बाबूलाल वैद्य जी लोगों से पैसा लेकर बुखार व अन्य बीमारियों की दवाओं को देते हैं। इतना ही नहीं फिल्म के कुछ एक दृश्यों  में ग्रामीण महिलाओं का एक साथ काम करते भी दिखाया गया है, जिससे ग्रामीण प्रेम और सद्भाव दिखाया गया है।

फिल्म के कितने ही दृश्यों में ग्रामिणों के भोलेपन को दिखाया गया है। बाबूलाल वैद्य उनके भोलेपना का खूब लाभ उठाता है। वह मोहन के खिलाफ गाँव वालों को भडकाता है और बीमारी के बहाने उनसे पैसा भी ठगता है। फिल्म में एक ऐसा ही संवाद देखिये जहाँ एक भोलाभाला ग्रामीण वैद्य जी के पास आता है और वह उसे मुर्ख बनाकर दवा देता है।

 

बाबूलालः- बुखार-वुखार नहीं है तो फिर हैं हैं क्यों कर कर रहा है।

ग्रामीणः- पर अजी मोको तो बुखार हयी ना, मैं कैसे मानू।

बाबूलालः- कैसे नहीं मानेगा वैद्य तू है या मैं, हमने जब कह दिया तो बुखार को होना पडेगा। पूरी 15 (पंद्रह) पीढियों से हमारे

बाप-दादा ऐसे ही वैदक करते आये हैं।

ग्रामीणः- अजी बुखार से पहले जाडा तो चढे है पर मोको तो बिलकुल जाडा लगये ना है।

बाबूलालः- बताओं इन गंवारों को कैसे समझाये…….।

 

 

छूआछूतः- जैसा कि फिल्म का नाम ही अछूत कन्या है। तो यह स्वाभाविक है कि फिल्म समाज में फैली छूआछूत की बुराई पर कुठाराघात करती दिखाई देती है। फिल्म में मोहन और दुखिया कि मित्रता ब्राह्मण और अछूत की दिखाई गई है। इनके बच्चों के प्रेम को भी समाज स्वीकार नहीं करता है और फिल्म में मित्रता तथा प्रेम दोनों का विरोध होता है। फिल्म में छूआछूत और प्रेम का विरोध करने वालों में बाबूलाल वैद्य अपनी अहम् भूमिका अदा करता है, क्योंकि गाँव वालों की चौकडी बाबूलाल वैद्य की दुकान पर ही लगती है। वह मोहन के घर पर होने वाली एक-एक बात को बाबूलाल के पास बताते रहते हैं। फिल्म में कल्याणी भी कई जगह छूआछूत मानने वाली दिखाई गयी है। प्रताप और कस्तुरी को एक साथ घुमते और साथ रहते देखकर कल्याणी कुछ दुखी सी होती है। फिल्म का एक संवाद जहाँ मोहन और कल्याणी आपस में बातें करते हैं।

मोहनः- अभी लडकपन है, कुछ दिन और खेलने कूदने दो।

कल्याणीः- क्या उम्र भर बच्चे ही रहेगें। अभी ब्याह के लायक हो गया है।

मोहनः- हाँ जोडी तो बडी अच्छी रहेगी।

कल्याणीः- क्या?

मोहनः- हाँ, मैंने कहा कस्तुरी हमारी जात की होती तो प्रताप के लिए कैसी अच्छी होती।

कल्याणीः- होती तब ना पर वो तो अछूत की बेटी है, इनका इस तरह मिलना मुझे अच्छा नहीं लगता।

 

इस दृष्टि से फिल्म में पटकथा के साथ-साथ संवाद भी बहुत ही अच्छा रहा है। फिल्म का हर एक किरदार अपने कार्य को बहुत ही सराहनीय तरीके से करता नजर आता है। इस फिल्म को जितनी लोकप्रियता अपने नाम और काम से मिली उतनी लोकप्रियता इस फिल्म के सबसे प्रसिद्ध गाने मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूं रे से भी मिली है। फिल्म में गाने के बोल इस प्रकार हैं-

 

गाने के बोल:

मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूं रे
मैं बन का पन्छी बन के संग संग डोलूं रे
मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूं रे
मैं बन का पन्छी बन के संग संग डोलूं रे

मैं डाल डाल उड़ जाऊँ
नहीं पकड़ाई मैं आऊँ
मैं डाल डाल उड़ जाऊँ
नहीं पकड़ाई मैं आऊँ
तुम डाल डाल मैं पात पात
बिन पकड़े कभी न छोड़ूँ
संग संग डोलूं रे
तुम डाल डाल मैं पात पात
बिन पकड़े कभी न छोड़ूँ
संग संग डोलूं रे
बन बन बोलूं रे

मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूं रे
मैं बन का पन्छी बन के संग संग डोलूं रे
मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूं रे
संग संग डोलूं रे

 

 

फिल्म के सभी पक्षों पर दृष्टि डाले अर्थात् इसकी पटकथा, संवाद योजना, गाने, दृश्यों आदि पर तो हम पाते हैं कि वास्तव में फिल्म उस दौर में भी और आज के समाज में भी फैली ऐसी रुढियों और बुराइयों पर हमला बोलती नजर आती है। जिसे दूर करना ही होगा, क्योंकि राष्ट्र के विकास में ये सभी बुराइयाँ एक बहुत बडा पत्थर है। फिल्म का पूरा ताना बाना सामाजिक सरोकार लिए हुए है और भारतीय समाज में फैले जात-पात के अंतर विरोध को उजागर करती नजर आती है। यह फिल्म अपने नाम की तरह काम करती दिखाई पडती है।

 

 


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