नई सोच का परिणाम है पितृ दिवस

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मित्रों, पितृ दिवस पर कितने ही लोगों ने लिख डाला है। पाश्चात्य का एक और प्रभाव लोगों के दिलो दिमाग पर राज करने लगा है। क्या पिता को मनाने के लिए किसी खास दिन की जरुरत होती है? यह नई सोच पता नहीं कहां से उपजी है। हमारे ग्रंथ एवं विद्वानों का मानना है कि माता धरती के समान है, जो सारे दर्द सहन करके भी अपनी संतान का पालन-पोषण करती है और पिता असमान की तरह है, जो हमेशा छत की तरह बने रहकर उनकी रक्षा करता रहता है और अपने बच्चों के लिए हर संभव प्रयास करके उनका भरण-पोषण करता है। माता-पिता दोनो ही बच्चों के भलाई के बारे में सोचते रहते हैं। उनका दिया हुआ जन्म हम कैसे भूला सकते हैं। फिर उनके लिए एक दिन मनाकर क्या उनको खुश किया जा सकता है, कभी नहीं। जहां तक मैं मानता हूं कि साहित्य हमेशा नई सोच को भी लिखता है और उसका परिणाम है आपका बंटी नामक उपन्यास। उपन्यास में मन्नू भंडारी ने आधुनिक माता-पिता की सोच पर प्रकाश डाला है और कैसे प्रेम विवाह करने वाले लडका-लडकी जल्द ही अलग-अलग रहने लगते हैं और दोनो ही फिर से नए संबंध बनाकर अलग-अलग शादी भी कर लेते हैं। लेकिन उन दोनों से पैदा हुआ बच्चा कैसे समाज में अपना स्थान नहीं बना पाता और वह केवल ठोकर ही खाता रहता है। उस पर लेखिका ने प्रकाश डाला है। देह खुख की कामना में, जो बच्चा पैदा हुआ और उसे किसी ने नहीं पाला। तो ऐसे वातावरण में तो पितृ दिवस मनाना सही है, क्योंकि उस बालक को न माता का प्यार मिला और न ही पिता का तो वह एक दिन आकर अपने माता-पिता से मिल लेता है और अपनी बातों को भूलाने का प्रयास करता है। लेकिन वास्तविता से सोचा जाए तो ऐसा माहौल और ऐसे पैदा होकर पलने वाला बच्चा राष्ट्र को नई सोच देगा। इससे सही संस्कृति की भावना फैलेगी? नहीं, बल्कि देहिक भूख की भावना फैलेगी। नए कानून बनेंगे, नई सोच उत्पन्न होगी, नया समाज बनेगा और चारों ओर केवल देह खुश ही सर्वोपरी होगा। इसके बहुत से परिणाम तो हम साचारपत्रों में पढ भी लेते हैं। प्रेमी के साथ मिलकर ल़डकी ने घरवालों को जहर दिया अर्थात् माता-पिता को मार दिया। प्रेम के कारण पत्नि ने पति को मार दिया। मैंने आपका बंटी उपन्यास का जिक्र इसलिए किया, क्योंकि वह कहीं न कही हमारी आधुनिक सोच को दर्शाता है। जिसके कारण समाज में ऐसे पाप बढ रहे हैं और कितने ही बच्चे माता-पिता के प्यार से अछुते रह जाते हैं। हम भारतीय संस्कृति के लोग हैं। हम रोज माता-पिता के दर्शन करके और उनका आशीर्वाद लेकर ही घर से निकलते है और अपने काम को अंजाम देते हैं। हमारे यहां इन सभी दिनों की अभी आवश्यकता नहीं है। हां, भविष्य में हो सकती है। लेकिन हम साहित्य और अध्यापन से जुडे लोग अपनी संस्कृति को अपनी कलम के माध्यम से बचाने का हर संभव प्रयास करेंगें और बदलती मानव सोच पर लेखन के माध्यम से ऐसे ही कुठाराघात करते रहेंगे।

डॉ. नीरज भारद्वाज