एक और संग्राम का साक्षी बना नंदीग्राम

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तारकेश कुमार ओझा, नंदीग्राम (पू. मेदिनीपुर) : पहले हिंसक प्रतिरोध और फिर जनादेश के जरिए अपनी बात मनवाने के लिए विश्व में अपना लोहा मनवा चुका पूर्व मेदिनीपुर जिलांतर्गत नंदीग्राम सोमवार को एक और ‘संग्राम’ का साक्षी बना। 2007 का क्रांतिकारी नंदीग्राम 2013 में एक मायने में सत्ता प्रतिष्ठान के पर्यवेक्षक की भूमिका में नजर आया।

2007 के बहुचर्चित भूमि अधिग्रहण के विरोध में उठ खड़े हुए नंदीग्राम के उस आंदोलन में कुल 42 लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। इस आंदोलन के दूसरे साल 2008 में हुए पंचायत चुनाव में नंदीग्राम समेत समूचे पूर्व मेदिनीपुर जिले ने तत्कालीन वाममोर्चा शासन पर ‘प्रथम व निर्णायक प्रहार’ करते हुए जनादेश के जरिए पंचायती राज की सत्ता माकपा से छीन कर भूमि आंदोलन में सहयोग के लिए तृणमूल कांग्रेस को सौंप दी थी। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में भी जिले ने दोनों लोकसभा सीटें तमलुक और कांथी माकपा से छिन कर तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवारों को सौंप दी। जबकि 2011 में हुए विधानसभा चुनाव में जनपद की कुल 16 सीटें एक मुश्त माकपा के विरोध में तृणमूल कांग्रेस की झोली में गई। लेकिन कालांतर में नंदीग्राम समेत जनपदवासियों के प्रतिवादी के बजाय सत्ता प्रतिष्ठान के पर्यवेक्षक की भूमिका में नजर आने से पक्ष-विपक्ष दोनों सहमे नजर आए। सोमवार को मतदान केंद्रों में खड़े कई मतदाताओं ने कहा कि ‘राजनीति से वे ज्यादा साबका नहीं रखते। लेकिन इतना चाहते हैं कि 2007 के दौरान जो बुराई तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठान में घर कर गई थी, वर्तमान सत्तारूढ़ दल इससे दूर रहे।’ अन्यथा जिले का प्रतिवादी चरित्र फिर मुखर हो सकता है। वरिष्ठ तृणमूल कांग्रेस नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री शिशिर अधिकारी इसे एकतरफा लड़ाई करार देते हुए दावा करते हैं कि मैदान में मुकाबले को कोई नजर नहीं आता। वहीं माकपा नेता व पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष निरंजन सिही इस बार ‘अलग तरीके से संत्रास’ का आरोप दोहराते हुए कहते हैं कि कई प्रखंडों में सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने मतदाताओं से कहा कि उनका वोट उन्हें ‘प्राप्त’ हो चुका है। इसलिए मतदान की आवश्यकता नहीं। बहरहाल आरोप-प्रत्यारोप पर जनमत का अंतिम फैसला आगामी 29 जुलाई को ही सामने आ पाएगा।

दैनिक जागरण से साभार
तारकेश कुमार ओझा,
भगवानपुर,

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