सत्ता की महत्ता …

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प शिचम बंगाल में इन दिनों  मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का एक जिलास्तरीय नेता माकपा के खिलाफ आंदोलन में आवश्यकता होने पर पुलिस को भी बम मारने की कार्यकर्ताओं को सलाह देकर मुशिकल में पड़ गया है। क्योंकि मुख्यमंत्री उनसे नाराज बताई जा रही है। टीएमसी के दूसरे नेता तो उसे लड़ाकू नेता बता कर महिमामंडित कर रहे है। लेकिन खुद मुख्यमंत्री उससे खासी नाराज बताई जाती है। इसे देखते हुए पार्टी के दूसरे कागजी शेर भी सहम गए हैं, और बाकायदा प्रेस वार्ता कर अपने बड़बोलेपन के लिए क्षमायाचना कर रहे हैं। दरअसल 2007 में ऐतिहासिक नंदीग्राम आंदोलन के बाद से ममता बनर्जी के पक्ष में माहौल बनते जाने के फलस्वरूप  उनके सिपहसलारों में बड़बोलेपन की होड़ सी मची हुई है। मुख्यमंत्री के मंत्रीमंडल के कुछ सदस्य माकपा समथर्कों की तुलना विषाक्त सांप से कर चुके हैं, तो एक मंत्री ने माकपा के सामाजिक ब हिष्कार का आह्वान करते हुए लोगों से आग्रह किया कि नुक्कड़ के  किसी चाय की दुकान पर गपशप करते हुए यदि कोई माकपा समर्थक वहां आ जाए, तो तुरंत वहां से हट जाएं। यहां तक किसी माकपा समर्थक परिवार के शादी – ब्याह से भी दूर रहे। हालांकि बावेला मचने के बावजूद तब ज्यादा कुछ नहीं हुआ था। लेकिन एक नेता के पुलिस को बम मारने की सलाह पर मुख्यमंत्री नाराज हो गई। दरअसल ममता बनर्जी के मूड का अंदाजा लगाना काफी कठिन माना जाता है। हजारों करोड़ के शारदा घोटाले में दो सांसदों समेत कई तृणमूल कांग्रेस नेताओं का नाम आने के बावजूद अप्रत्याशित रूप से ममता बनर्जी ने नरम रुख अपनाते हुए आरोपी नेताओं का बचाव किया।  लेकिन बम मारने की सलाह देने पर एक नेता पर कुपित हो गई। दरअसल सत्ता की महत्ता ही कुछ ऐसी है। प्रदेश के लोग उन माकपा नेताओं को नहीं भूले हैं, जो छोटा अंगरिया नरसंहार कांड के बाद अपने पार्टी दफ्तर में चाय पीते हुए इस बात की शिकायत करते थे कि सीबीआई उन्हें फरार करार दे चुकी है, जबिक उनकी दिनचर्या में बिंदुमात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ है। कुछ साल बाद ऐसे नेता जेल भी गए, और बारी भी हो गए। तब सत्तारूढ़  माकपा ने भी इन आरोपी नेताओं को पार्टी की संपत्ति  की संज्ञा से विभूषित किया था।
लेखक दैनिक जागरण से जुड़े हैं। 
तारकेश कुमार ओझा,
भगवानपुर,