नई विधा मैं जानती हूँ

0 commentsViews:
image
एक वामा हूँ नए जगत की
नई विधा मैं जानती हूँ
हवाएँ गर्म हैं
फिज़ाएँ नर्म हैं
धूप सिमटी हुई
सोचती मर्म है
पर खोज ही लूँगी ठंढ़ी बूँदों को
उसे पास बुलाना जानती हूँ
कितना शोर है
आँधियाँ जोर हैं
सोया हुआ आज
जीवन का मोर है
पर खोज ही लूँगी मीठे सुरों को
उसे लय में लाना जानती हूँ
समय कठिन है
रोता सा दिन है
आँसू झरे आज
जलता छिन है
पर खोज ही लूँगी तार समय के
उसे बुन लेना मैं जानती हूँ ।
एक वामा हूँ नए जगत की
नई विधा मैं जानती हूँ ।
पूनम शुक्ला

Facebook Comments