सबसे बड़ी ताकत ही सबसे बड़ी कमजोरी..

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( प्रो.उर्मिला पोरवाल  ) आजकल जब समाचार पत्र को पढ़ती हूँ तो पहले पृष्ठ पर महिला संरक्षण के लिए बनाए गए नये कानूनो की खबर देख प्रसन्नता होती है, लेकिन जैसे ही पृष्ठ पलटो, विकास के तमाम दावे खोखले नजर आते है जब अमानवीयता की, पशुप्रवृत्ति की नयी कहानी छपी नजर आती है और मेरी प्रसन्नता मायूसी में बदल जाती है। साथ ही मानसपटल पर अनेक सवालो के घने बादल छाने लगते है, और मन उलझ जाता है जवाबो की तलाश में।

सोचती हूँ ! अगर नित नये कानून बनाना इस समस्या का हल होता तो पहले से बने कानून असरकारक होते। दरअसल वो कहावत मशहुर है ना ‘कानून बनते ही इसलिए है कि तोड़े जा सके’। स्पष्ट है कि केवल कानून बनाकर महिला संरक्षण करना एक असफल प्रयास है। और सुरक्षा की बात करें तो दुनिया में ऐसा कोई स्थान है ही नहीं जहां एक महिला स्वयं सुरक्षित होने का दावा कर पाए। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, लेकिन कटु सत्य है कि आज नारी वर्ग अपने घरो में ही सुरक्षित नहीं है, नित नूतन घटित होती घटनाएँ यह साबित भी कर रहीं हैं कि कोई रिश्ता विश्वसनीय नहीं रहा। और इस प्रकार की घटनाओ ने नारी वर्ग का मनोबल तोड़ कर रख दिया है।

किस रावण को मार भगाऊ!!
किस लंका में आग लगाऊ!!
घर-घर रावण, घर-घर लंका!!
इतने राम कहां से लाऊ!!

स्त्री-मुक्ति या स्त्री-स्वतंत्रता के पीछे छुपे सत्य को जानने के लिए जब इतिहास में झाँकती हूँ, तो पता चलता है कि नारी वह है जो जन्म से ही अनगिनत सामाजिक बंधनो से घिरी होती है, सामंती समाज के पास स्त्री के लिए अलग कायदे होते है और पूंजीवादी समाज के पास अलग। समय बदला है फिर भी नहीं बदला है तो नारीजीवन का सच। आज भी स्त्री पारिवारिक सीमाओ-संस्कारो में बंधी हुई उपेक्षा भाव को सहती है, उसकी पसंद, पहनावा, खान-पान आदि से जुड़े फैसलें वो नहीं लेती बस समर्थन करती है।

हालांकि आज स्त्री अपने प्रति बहुत ज्यादा सचेत है वह शिक्षित है, कामयाब है, अपने पैरो पर खड़ी है, घर की दासता से उसे मुक्ति मिल चुकी है, आज वह समाज के द्वारा बनाए मूल्यो पर खुद को नहीं कसती, बल्कि अपने जीवन से जुड़े हर फैसलें को वो खुद लेती है। लेकिन कैद तब की हक़ीक़त थी और शोषण आज की। आज भी वो आजाद नहीं है, बस आजादी के ‘आभास’ को सच मानकर जश्न मना रहीं है।

मुझे लगता है….नारी की सबसे बड़ी ताकत (सहनशीलता) ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। कहते है ना-
अति का भला न बरसना
अति की भली न चुप!!

किसी भी बात में अति हो तो परिणाम घातक ही होते है। आज कोई कुछ भी कह जाता है, अमानवीयता पर उतर आता है, वजह बस एक-नारी की सहने की आदत और चुप रहने की प्रवृत्ति, किसी के लिए भी अपनी मानसिक उथल-पुथल को किसी दूसरे के सामने रखना आसान नहीं होता परन्तु स्त्री-वर्ग को आत्मविश्वासी बनना होगा, वार करना तो उसके स्वभाव में नहीं पर जवाब देना सीखना होगा, दुनिया से जीतने के लिए, सुरक्षित जीवन के लिए, निर्भयता से जीने के लिए खुद से लड़ना होगा, अपने आपको जानने के लिए नारी को अपनी हद से पार जाना होगा। इस समस्या से निजात पाने की दिशा में यह पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है।