परिवर्तन- गांधी जयंती- अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस

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प्रो. उर्मिला पोरवाल (सेठिया)
(बैंगलोर) “दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल” “साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल”
भारत का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है भारत रत्न! इस सम्मान से बड़ा किसी सम्मान को नहीं माना जाता है. लेकिन भारत में एक ऐसे शख्स भी थे जिनके लिए इस सबसे बड़े सम्मान की गरिमा भी कम नजर आती है और वह थे मोहनदास करमचंद गांधी। भारत विश्व का एक अनोखा और अनूठा देश है. इस देश की सांस्कृतिक विरासत से लेकर यहां का पूरा इतिहास ही गौरवशाली है. हमारे इतिहास की तरह हमारी आजादी की लड़ाई भी एक मिसाल ही है. यूं तो विश्व के अधिकतर गुलाम देशों को आजादी हिंसा के बाद ही मिली लेकिन इस देश को आजादी वास्तविक तौर पर अहिंसा के मार्ग पर चलने की वजह से मिली और इस मार्ग पर हमें चलने का साहस प्रदान किया मोहनदास करमचंद गांधी ने। माता-पिता द्वारा दिया यह वास्तविक नाम भले ही कम सुनने में आता हो परन्तु उन्होने अपने कर्म और व्यवहार से जो नाम कमाया वह था राष्ट्रपिता, बापू और महात्मा, इस सम्मान के पीछे गांधी की महान कार्यशैली और समर्पण छुपा हुआ है. अपने घर-परिवार को भूल गांधीजी ने खुद को देश के लिए न्यौछावर कर दिया, इसी वजह से लोग गांधी जी को मात्र एक शख्स के तौर पर नहीं अपितु एक भगवान के समान देखते हैं. आज उसी महात्मा गांधी (डंींजउं ळंदकीप) की जयंती है…
02 अक्टूबर एक ऐसा दिन है जब हम सब मिलकर राष्ट्रपिता को याद करते हैं. गांधी जयंती पर अपने बापू को याद करना तो सभी के लिए आसान है. दो मिनट उनका नाम लिया और याद कर लिया लेकिन वर्तमान में याद के साथ ही प्रारम्भ हो जाती है सवालियां चर्चा- ऐसा क्यूं है कि हम मात्र एक दिन बापू जी के कर्तव्यों को याद कर बाद में उन्हें भुला देते हैं? क्या हम उनकी शिक्षा पर भी अमल कर सकते हैं? क्या आज गांधी हमारे लिए सिर्फ नोट पर बनी आकृति के तौर पर रह गए है?आखिर क्यूं देश में आज भी कई लोग गांधीजी का विरोध करते हैं? नतीजा कुछ यूं मिलता है कि तथाकथित देशप्रेमियों और राष्ट्रवादियों की नजर में बापू की वजह से देश का विभाजन हुआ था. लेकिन वह आखिर यह क्यूं नहीं देख पाते कि यह देश आजाद भी गांधीजी की वजह से ही हुआ है. देश के लिए न जानें कितने डंडे खाने का गांधीजी को यह फल मिला कि आज उनकी जन्मतिथि पर किसी को उन्हें याद तक करने का समय नहीं. सौ के नोट पर गांधीजी तो सबको चाहिए लेकिन मूल जीवन में गांधी जी के बताए रास्ते पर चलना तो दूर लोग गांधी जी की परछाई से भी दूर रहना पसंद करते हैं…आज गांधी जी के मूल्यों पर चलने का जोखिम युवा वर्ग लेना ही नहीं चाहता. गर्म-मिजाज और अधिकारों के आगे कर्तव्यों को भूल जाने वाला युवा वर्ग किसी भी कीमत पर अहिंसा के मार्ग पर नहीं चलता. आज एक गाल पर थप्पड़ पड़ने पर दूसरा गाल आगे करने वालों की जगह “ईंट का जवाब पत्थर से देने वालों” की संख्या कहीं अधिक है…इस प्रकार इन सबने गांधी जी के अनशन के फॉर्म्यूले को तो आज कई तथाकथित गांधी प्रेमियों ने ब्लैकमैलिंग का स्वरूप दे दिया है। इस विशय में तो मेरा मानना यह है कि महात्मा गांधी कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते क्यंूकि उन्होंने ताउम्र जो मुद्दे उठाए और जिन सिद्धांतों को प्रसारित किया, उनकी जरूरत आज भी उतनी ही है जितनी पहले थी,….गांधीजी एक महान समाज सुधारक थे-
स्वयं को पाने का सर्वोत्तम तरीका है
स्वयं को अन्य लोगों की सेवा में समर्पित कर देना
उनके यह वचन उनकी मानसिकता को प्रदर्शित करते हैं. गांधीजी ने जिंदगी भर दूसरों की सहायता के लिए काम किया. तमाम वैभव होने के बाद भी गांधीजी ने सादा जीवन व्यतीत किया और लोगों के सामने उदाहरण पेश किया. छुआछूत को दूर भगाने के लिए ही उन्होंने ‘हरिजन’ को गले लगाकर दूसरों के सामने एक उदाहरण पेश किया।समाज की बुराइयों के प्रति गांधी जी के सिद्धांतों ने उनके राजनैतिक आंदोलनों को उपनिवेशराज से आजादी के लिए मजबूती से बांध दिया जैसे कि असहयोग आंदोलन, नागरिक अवज्ञा आंदोलन, दाण्डी मार्च और भारत छोड़ो आंदोलन. गांधी जी के प्रयासों से अंततः भारत को 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त हुई.। स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े योद्धा को जिसने बिना हिंसा किए देश को आजादी दिलाई उसके लिए महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाईन ने कहा था कि आने वाली सदियों में लोग यह विश्वास नहीं कर पाएंगे कि गांधी जैसा महान व्यक्ति भी इस धरती पर कभी पैदा हुआ था. दरअसल, महात्मा गांधी (डंींजउं ळंदकीप) जी ने अपने जीवन में कई ऐसे कार्य या प्रयोग किए, जो कोई महापुरुष ही कर सकता है! सच तो यह है कि गांधी जी ने न केवल दूसरों का मार्गदर्शन किया, बल्कि उपदेशों का पहले स्वयं पर प्रयोग भी किया।
गांधीजी को अहिंसा का पुजारी और भारत के राश्ट्रपिता के रूप में संबोधित किया जाना सर्वथा उचित है। और इस बात से तो सभी भलीभाँति परिचित हैं कि जिन चीजों से मिलकर हमारा भारत बना है, उनमें महात्मा गांधी भी षामिल है। अगर मैं यह कहँू कि-महात्मा गांधी के बिना भारत की कल्पना ही नहीं की जा सकती-तो अतिष्योक्ति नहीं है। गांधीजी के जन्मदिवस पर उन्हें याद करके उनके सत्य, अहिंसा और सौहार्द्र के संदेष पर हमें फिर से विचार करना होगा साथ ही यह स्वीकारना होगा कि उनके द्वारा बताए गए रास्ते को अपनाकर ही असत्य, और दायित्वहीनता पर विजय प्राप्त की जा सकती है। ऐसा नहीं है कि सत्याग्रह और अहिंसा सिर्फ भारत में ही प्रचलित हैं बल्कि सत्याग्रह और अहिंसा की विचारधारा को वैश्विक समुदाय में भी उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त है और इसीलिए संयुक्त राष्ट्र में गांधी जी के जन्म दिवस, 2 अक्तूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस (प्दजमतदंजपवदंस क्ंल व िछवद-टपवसमदबम) के रूप में अपनाया गया है.।
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