विवाह-आडम्बर

हमारा समाज बहुत उन्नतिशील है, इस समाज का बड़ा ही गरिमामय, अनुशआसनबद्ध और सात्विक इतिहास रहा है। जैसा कि हम सभी जानते हैं किसमाज एक व्यवस्था का नाम है, जिसका निर्माण समान  रीति रिवाज आपसी मेल-मिलाप एवं रिश्तें-नातों खान-पान, धर्म, विधि-विधान, नीति-नियम आदि को आधार बनाकर व्यक्तियों के समूह द्वारा किया जाता है और विवाह जीवन के 16 संस्कारों में सबसे महत्त्वपूर्ण संस्कार है, जिसके माध्यम से सामाजिक पक्ष मजबूत होता है। हिन्दू विवाह पद्वति पूरे विश्व में सर्वश्रेष्ठ पद्वति मानी जाती है। जहां विवाह मात्र एक समारोह नहीं होता बल्कि एक पवित्र धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है, इसमें संदेह नहीं कि विवाह-प्रथान ने मानव समाज को सुसंगठित और विकसित बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके माध्यम से एक तरफ तो मनुष्य एक दूसरे से पारिवारिक रूप से जुड़ जाते हैं और उनमें आपसी सहयोग की भावना जागृत होती है, साथ ही जीवन क्षेत्र में एकात्म भाव उत्पन्न होता है और उनकी शक्ति एक और एक मिलकर ग्यारह के समान हो जाती है। साथ ही साथ दूसरी तरफ विवाह दो आत्माओं का पवित्र बंधन भी है, जिसमें दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। हम सभी जानते हैं कि स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएं और कुछ अपूर्णताएं दे रखी हैं। विवाह सम्मिलन से वे दोनों एक दूसरे की अपूर्णताओं को अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं। इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है उस समय मनुष्य का एकाकीपन मिटकर उसे एकजीवन-साथी भी मिलता है, जिससे सुख-दुख, सम्पत्ति-विपत्ति में सहारा मिलने का पूरा भरोसा रहता है। इसलिए विवाह का सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है। स्त्री और पुरुष दोनों एक-दूसरे को अपनी योग्ताओं और भावनाओं का लाभ पहुंचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते रहें यहीं विवाह का उद्देश्य रहता है। सामान्यता: विवाह का मुख्य रूप यही होता है कि कन्या का पिता किसी सुयोग्य वर को देखकर पुरोहित द्वारा शास्त्रानुसार धार्मिक अनुष्ठान के माध्यम से कन्यदान करता है। परन्तु आधुनिक विश्व में विवाह अब अनगिनत विकल्पों और समझौतों का विषय बन गया है। इस समय विवाहों में जो सबसे बड़ी खराबी पैदा हो गई है वह है उसे अत्यंत खर्चीला बना देना। कुछ बड़े लोगों ने अपनी शान दिखाने के लिए नए-नए तरह के खर्च बढ़ाकर विवाह प्रथान को ऐसा खर्चीला बना दियाहै कि साधारण स्थिति के व्यक्ति का उसकी थोड़ी बहुत नकल करने में ही दिवाला निकल जाता है। उसके लिए वह कई समझौते भी करता है और उसका दुष्परिणाम उसे वर्षों तक सहना पड़ता है।
निश्चित तौर पर विवाह एक हर्षोत्सव अवश्य है और उस अवसर पर दो आत्माओं और दो परिवारों में एक गहरा संबंध भी स्थापित होता है जिससे आगे चलकर अनेक शुभ परिणाम होने की सम्भावना रहती है। इसलिए ऐसे अवसर पर दांस-पांच इष्ट-मित्रों को बुलाकर आमोद-प्रमोद मनाया जाए तो उसमें अनुचित बात नहीं है। इसी प्रकार यदि हर वर-कन्या के अभिभावकों की तरफ से उन दोनों को कुछ उपहार दिए जाएं तो भी उसे बुरा नहीं कहा जा सकता। शास्त्र-विधि के अनुसारयदि पाणिग्रहण करने के साथ-साथ थोड़ा बहुत खुशी और मनोरंजन का कार्यक्रम बनालिया जाए तो विवाह को जीवन की एक विशेष घटना के रूप में याद रखने का अवसर मिलता है।पर जब येबातें एक सनक या पागलपन का रूप धारण कर लेती है तो वे हमारी आर्थिक स्थिति के लिए खतरनाक बन जाती है। यही कारण है कि आजकल लोग पड़े परेशान हैं और विशेषत: विवाहों से तो भगवान के कोप की तरह डरते रहते हैं।
प्राचीन स्मृतियों तथा पुराणों के उपाख्यानों में विवाह प्रणाली का जो वर्णन मिलता है उसमें कहीं विवाह के पहले दहेज की रकम तय करने, बड़ी-बड़ी बारात ले जाने, कई-कई दिन तक नाच-गाने और दावतें होने का वर्णन नहीं है। उनमें  हवन करके देवताओं की साक्षी में वैवाहिक प्रतिज्ञाएं करने का विधान विस्तारपूर्वक अवश्य दिया गया है। पर तरह-तरह के चाल-चलन, नेग-जोग और खर्चीले आडम्बरों का उल्लेख नहीं पाया जाता। जिससे विवाह के उत्सव का व्यय-भार तो कम नहीं होता। बल्कि बारात सजाने और ले जाने में बेटे वाले को और स्वागत-सत्कार में बेटी वाले को कमरतोड़ आर्थिक दबाव सहना पड़ता है।
बेटे वाला अपनी शोभा बनी देखखर बाराती का उपकार मानता है और उसे ले जाने में सवारी एवं अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करता है। बेटी वाला अपनी सामथ्र्य भर प्रयत्न करते हुए बारात को ठहराने, खिलाने एवं स्वागत सुविधा के साधन जुटाने में उसे कितनी चिंता और भागदौड़ करनी पड़ती है।
दोनों ही पक्ष अपनी अपनी शतरंज की चालें चलते रहते हैं। एक तरफ बेटे वाला चाहता है कि ऐसा संबंध पक्का किया जाए कि अधिस के अधिक दहेज मिले। इसके चलते वे अपने पुत्र का सत्य मिथ्या मिश्रित गुणगान करने में भी नहीं हिचकते और दूसरी तरफ लड़की वाला उस घर की तलाश करता है जो उनकी बेटी को अधिक से अधिक जेवर चढ़ा सके। उस प्रतिस्पर्धा में दोनों पर Cभारी आर्थिक दबाव पड़ता है और दोनों आर्थिक दृष्टि से खोखले हो जाते हैं। साथ ही जो स्त्री और पुरुष वैवाहिक जीवन में प्रवेश कर रहे होते हैं उनके अपने कुछ सपने और ख्वाब होते हैं वे इन बातों से अनभिज्ञ। आम्डबर के चलते परिवारजन शतरंज की कभी-कभी ऐसी चाल चल जाते हैं कि उनकी पारिवारिक जीवन की सुख शांति खो जाती है। कोई नहीं चाहता कि उनके वैवाहिक संबंधों में दरार आए। परन्तु पति-पत्नी समझ भी नहीं पाते हैं कि उनके बीच कलह का कारण क्या है और सभी ख्वाब टूट कर बिखरने लगते हैं। परिणामस्वरूप अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और विवाह असफल। स्पष्ट है विवाह-शादियों के समय होने वाले अपव्यय और आडम्बर हमारे समाज की सबसे बड़ी कुरीति है। समस्त हिन्दू समाज में ऐसी अलग-अलग तरह की प्रथाएं और परम्पराएं  प्रचलित हैं। जो एक दूसरे से बिलकुल विपरीत है और अपनी-अपनी जातियों और उपजातियों में मानवीय तथा धर्मानुकूल मानी जाती है। इस कारण अगर कोई यह विचार करे कि इस समय उनके यहां जो प्रथाएं प्रचलित हैं वे ईश्वरीय आदेश है तो उनकी यह उनकी अज्ञानता है।rp_Copy-of-up-150x150.jpg