तलाक़ तलाक़ तलाक़……

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(रेखा जसोरिया)
मैं इसे नसीब कहूँ ,या कहूँ इत्तेफ़ाक…
ना बन सकी उससे तो कह दिया
तलाक़ तलाक़ तलाक़……
मैने हर लम्हा जिसे चाहा, जिसे दिल में रखा…
जिसका रस्ता मैने हर शाम उम्मीदों से तका…..
जिसकी खा़तिर मैं होती रही हर लम्हा ख़ाक…..
ना बन सकी उससे ,तो कह दिया
तलाक़ तलाक़ तलाक़……
उसकी हर एक ख़्वाहिश मुझे अपनी सी लगी…
उसका हर एक ग़म ,मैने अपना सा सहा…
कि मैं होती रही रफ़्ता रफ़्ता उसके लिए राख़…
ना बन सकी उससे तो कह दिया
तलाक़ तलाक़ तलाक़……
टूटे धागों सी जुड़ी मै यूँहीं उससे कई बार..
गांठें दिल में जो चुभी फिर भी मैने उफ़ ना की…
उसके ज़ुल्मो सितम सहती रही मैं यूँहीं चुपचाप…
ना बन सकी उससे तो कह दिया
तलाक़ तलाक़ तलाक़……
ज़िन्दगी आज यूँ मुट्ठी में रेत जैसी है…
फिसल रही है लम्हा लम्हा यूँ ही रेशम की तरह…
वो दूर है मगर मिटते नहीं उसके दिए दाग़…
ना बन सकी उससे तो कह दिया
तलाक़ तलाक़ तलाक़……

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