सोशल मीडिया – डॉ.रूपाली दिलीप चौधरी

सोशल मीडिया
डॉ.रूपाली दिलीप चौधरी (महाराष्ट्र)

आज के दौर में मीडिया विमर्श की चर्चा गहनता से हो रही है | जिसमें फिल्म, अखबार ,वेब ,संगणक ,दूरदर्शन, पत्रिका यह सब मीडिया में छाया हुआ दिखाई देता है | 1914 में प्रारंभ हुआ भारतीय सिनेमा और सन 2014 में अपने कार्य पूर्ति का शतक पूर्ण कर चुका है | राजा हरिश्चंद्र से शुरुआत हुआ तो हरिश्चंद्र की फैक्ट्री के शतकीय मुकाम पर आज पहुंच चुकी है | जिसमें प्रधान नेतृत्व दादा साहब फाल्के तथा भालजी पेंढारकर, बाबूराव पेंटर, गुरुदत्त ,राज कपूर ,लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी ,सत्यजीत राय ,मुंशी प्रेमचंद ,विमल रॉय,दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, गुलजार ,नूतन ,जैनेंद्र कुमार, साहिल लुधियानवी, राजदत्त जब्बार पटेल जैसे अनेकानेक असीम प्रतिभाशाली कलाकारों ने शतकीय हिंदी सिनेमा को अपने योगदान से गौरवान्वित किया | आलम आरा दोस्ती पैसा मुग़ल-ए-आज़म मदर इंडिया आराधना शोले जैसी फ़िल्में शकीय हिंदी सिनेमा की मील का पत्थर बन चुकी है | विमल राय के निर्देशन में बनी सुजाता यह फिल्म और समुदायों की गहरी खाई को उजागर करती हैं | जिसमें ब्राह्मण नायक अधीर सुनील दत्त और अछूत नायिका सुजाता नूतन इनकी सफल प्रेम कथा के कथ्य में केंद्रीय दिखाई देती है | दलित विमर्श की 97 से एवं सामाजिक धार्मिक पाखंड का पर्दाफाश करने वाली फिल्म बदनाम बस्ती अंकुर अछूत कन्या पुनर्मिलन नया कदम जाग उठा इंसान द मून ऐसे तमाम फिल्में बनाई गई दलित विमर्श को उजागर किया गया | सत्यजीत रॉय के निर्देशन में प्रेमचंद की कहानी सद्गति पर हिंदी दलित जीवन की दर्दनाक दशा अभिव्यक्ति कहानी के रूप में एक फिल्म उभरकर आई जिसमें ओम पुरी स्मिता पाटिल तथा मोहन आगाशे के अभिनय से प्रभावित यह कलाकृति भीषण ब्राह्मणवाद के बराबर चित्र को साकार कर देती है |
वस्तुतः मीडिया विमर्श न केवल विकृत सामाजिकता को एवं छुआछूत की बीमारियों को तथा गांव की समस्याओं को शोषण एवं अन्याय अत्याचार को ही दर्शाती नहीं है अपितु मीडिया विमर्श इन सब का पर्दाफाश करता है | मीडिया के इस पर्दाफाश ने समाज में होने वाले सभी अन्य एवं अत्याचारों पर कड़ी कटाक्ष डाली है | जिसके द्वारा एक सामाजिक परिवर्तन का सर्वस्व वर्चस्व अदाकारी के रूप में मीडिया लेता है | आज तक कई समस्याओं को देखा गया लेकिन मीडिया विमर्श ने उन सभी समस्याओं को न केवल दिखाया बल्कि उन समस्याओं को सुलझाने का भरसक प्रयास भी किया | आने वाली पीढ़ी के लिए एक नया योगदान नई सीख ही नहीं दे पाता बल्कि उसके द्वारा उस समाज से भी यथोचित परिचित करा देता है | मीडिया विमर्श के कारण ही हम हमारे भारत को ही नहीं संपूर्ण विश्व को एक यथार्थ दर्शन के रूप में आत्मसात कर सकते हैं |