सचिन का वन-डे को अल्विदा

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क्रिकेट भारत में किसी धर्म से कम महत्व नहीं रखता। इसीलिए क्रिकेट में
आस्था रखने वालों के लिए सचिन रमेश तेंदुलकर क्रिकेट का भगवान है।
क्रिकेट के महायुद्ध भारत-पाकिस्तान सीरीज से पहले क्रिकेट के भगवान ने
वन-डे क्रिकेट को अलिवदा कह दिया। अब नीले रंग की जर्सी में नहीं दिखेंगे
सचिन मगर सफेद वर्दी में जरूर दिखेंगे। सचिन के इस फैसले की घोषणा
उन्होने खुद नहीं बल्कि बीसीसीआई की तरफ से प्रेसनोट जारी कर किया गया।
देश के क्रिकेट प्रेमीयों के लिए बडा झटका लगा मगर कैरियर के आखिरी पडाव
में कुछ खास न कर पाने की वजह से आलोचना करने वालों को सचिन ने मौन संदेश
दे दिया।
महज 16 साल की उम्र में सचिन ने 1989 में पाकिस्तान के खिलाफ जब क्रिकेट
में पदार्पण किया था तो लोगों को शायद यह अंदाज नहीं था कि छोटी कद का यह
खिलाडी विश्व के सभी कीर्तिमानों को बौना साबित कर देगा।  23 साल के
क्रिकेट कैरियर में सचिन ने बल्लेबाज के तौर पर विश्व के सारे रिकार्ड
अपने नाम कर लिया। यह सब आसान नहीं था मुश्किल हालात से निकल कर सचिन ने
यह मुकाम हासिल किया। जब भी सचिन के खेल की आलोचना हुई तो सचिन के बल्ले
ने गर्जन के साथ उसका जवाब दिया। सचिन के बल्ले के खौफ का अंदाज यह था कि
विश्व के महान लेग स्पिनर षेन वार्न को सचिन सपने में धुलाई करते नजर आने
लगे।
एक तरफ सचिन का बल्ला विश्व कीर्तिमान की उंचाईंया छू रहा था तो दूसरी
तरफ सम्मान उसके गले का हार बन रही थी। 62 वन-डे मैन आफ द मैच के साथ
1994 में अर्जुन पुरस्कार, 1997 में विस्डन क्रिकेट आफ द ईयर, 1997 व
1998 में राजीव गांधी खेल रत्न, 1999 में पद्मश्री पुरस्कार तथा 2008 में
पद्मविभूषण पुरस्कार से सचिन को नवाजा गया।
24 अप्रैल 1973 में मराठा परिवार में जन्में सचिन के पिता ने संगीतकार
सचिन देव बर्मन के नाम पर इनका नाम रखा। बडे भाई अजीत तेंदुलकर के
प्रोत्साहन ने इन्हे क्रिकेट खेलने को प्रेरित किया। 1995 में सचिन ने
अपने से उम्र में पांच साल बडी डाक्टर अंजली से षादी की। सचिन जितने
अच्छे खिलाडी हैं उतने ही अच्छे इंसान भी। क्रिकेट के अलावा सचिन एक
स्वयं सेवी संस्था के 200 बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी उठाते
हैं।


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