पीडि़तों के जख्मों पर हवाई दौरे का नमक

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एक पूरी की पूरी स्पेशल ट्रेन को रेलवे की भाषा में सेलून कहते हैं। बिटीश जमाने में अंग्रेज अधिकारी इसमें सफर किया करते थे। आज भी रेल मंत्री , रेल राज्य मंत्री , रेल महाप्रबंधक व रेलवे बोर्ड के अधिकारी इसमें यात्रा करते देखे जाते थे। ऐसे ही र्बिटेन में एक सनकी व्यक्ति ने एक गवर्नर को सेलून में सफर करते देखा, तो उसकी भी इच्छा इसमें यात्रा करने की हुई। पता करने पर उसे मालूम हुआ कि जीवन में सिर्फ एक बार सेलून में सफर करने के लिए उसे अपनी सारी संपत्ति बेचनी पड़ेगी। लेकिन सनकी भी कभी मानते हैं। लिहाजा उसने वहीं किया और पूरी संपत्ति बेच कर सेलून में सफर करने का अपना ख्वाब पूरा कर लिया। लगता है काफी कुछ ऐसी ही मनोदशा से हमारे राजनेता गुजर रहे हैं। एक तरफ उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में तबाही का मंजर हैं। सैकड़ों लोग मार्ग में फंसे हैं। खबर है कि रास्ते में फंसे बेहाल – परेशान पर्य़टकों के साथ लूट के साथ महिलाओं से बलात्कार तक हो रहे हैं। सेना की सक्रियता के बावजूद काफी पर्यटकों तक राहत नहीं पहुंच पा रही है। दूसरी तरफ हमारे राजनेताओं पर हवाई दौरे की सनक सवार है। यह देशवासियों के जख्मों पर नमक रगड़ना नहीं तो क्या है। किसी बाढ़ पीडि़त इलाके से साबका रखने वाला शख्स ही जानता है कि जब कहीं बाढ़ या दूसरी प्राकृतिक आपदा आती है, तो प्रशासनिक महकमे में किस कदर लूट मचती है। पीडितों के खाने के पैकेट से एक – एक सामान गायब कर दिया जाता है। दो – एक स्थानों पर पैकेट गिरा कर लाखों -करोड़ों का बिल पास कराने की कलाबाजी शुरू हो जाती है। सरकारी अधिकारी और बाबुओं की बन आती है। बिल – वाउचर गायब , सब कैस में होता है। लोगों व सामाजिक संगठनों से मिलने वाली सहायता पर ही पीडि़तों को स्थिति सामान्य होने का इंतजार करना पड़ता है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों का हवाई दौरा करने वाले राजनेता यदि उस क्षेत्र में जा कर यह पता लगाने का प्रयत्न करते, कि सचमुच पीडितों तक राहत पहुंच रही है या नहीं, प्रशासनिक महकमा ईमानदारी से कार्य कर रहा है या नहीं, कहीं इसके नाम पर लूट तो नहीं मचाई जा रही है, तो इसका समथर्न किया भी जा सकता था । लेकिन यहां तो हवाई दौरे का फोटो खिंचवा कर बौद्धिक ऐयाशी की तर्ज पर चैनलों पर बयान देकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री की जा रही है। क्या यह उचित है। आखिर हमारे राजनेताओं को सदबुद्धि कब आएगी।
लेखक दैनिक जागरण से जुड़े हैं।
तारकेश कुमार ओझा,
भगवानपुर,