टूटे गठबंधन और चतुष्कोणीय चुनाव

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पछले 20-25 दिन से चल रही मोल-तोल की राजनीति में आखिर बात
नहीं बनी और भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का 25 साल पुराना गठबंधन
तथा कांग्रेस पार्टी और शरद पवार (राकांपा) के बीच 15 साल पुराना गठबंधन
टूट गया। अब महाराष्ट्र में चतुष्कोणीय चुनाव होगा और अपने-अपने मद में
चूर पार्टियों को महाराष्ट्र का मतदाता बतलाएगा कि उसको
टूटे हुए गठबंधनों पर अपनी प्रतिक्रिया कैसे देनी है।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि सारे गठबंधन स्वार्थो
के गठबंधन होते हैं जिनमें सभी दल सŸाा चाहते हैं और अपने
दल का मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं परन्तु मुख्यमंत्री तो एक
ही बनता है जिसके लिए सबसे आसान फार्मूला सबसे बड़ा
दल होता है परन्तु इस बार 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में शिवसेना
ने घोषित कर दिया था कि भाजपा के लिए दिल्ली और और शिवसेना के लिए
महाराष्ट्र रहेगा। उसने शुरू से रट लगाई कि महाराष्ट्र में शिवसेना 151 सीटों
पर चुनाव लड़ेगी और भाजपा को केवल 119 सीटें देगी। शेष सीटें सहयोगी
दलों को दी जाएंगी परन्तु बात नही बनीं। बुधवार को शिवसेना ने नया सूत्र
दिया कि भाजपा 130 सीटें ले ले और शेष सहयोगियो को 7 सीटें दे दी जाएं।
जिस पर सहयोगी दल तैयार नहीं हुए। इस बार केंद्र में भाजपा की सरकार
है वह भी पूर्ण बहुमत की सरकार है, ऐसे में इस बार महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना
गठबंधन के लिए स्वर्णिम अवसर था कि वहां मोदी की 10-12 रैलियां करवाकर
कांग्रेस- राकांपा गठबंधन को परास्त कर दिया जाए परन्तु सारी योजना अधर
में लटक गई। कारण केवल एक ही है कि शिवसेना ने बड़ा ही कठोर रुख
अपना लिया था, अगर वही पुराने वाले गठबंधन की तरह गठबंधन होता तो बहुत
अच्छा अवसर था कि टूटे और बिखरे कांग्रेस और राकांपा को आसानी से परास्त
कर दिया जाए।वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस और राकांपा अड़े थे इस बार राकांपा
अपना मुख्यमंत्री चाहती थी और 144-144 सीटें यानी बराबर की भागीदारी चाहती
थी जो कांग्रेस को मंजूर नहीं था। राकांपा क्षेत्रीय पार्टी है उसका महाराष्ट्र में
व्यापक असर है उसको बराबर का दर्जा देने में कांग्रेस ने क्यों संकोच किया
समझ्ा से परे हैं।
पूरे देश में पिछले 15-20 दिनों से प्राय हर चैनल, हर समाचार पत्र, रेडियो
समाचारों में महाराष्ट्र के चुनाव पूर्व दंगल से समाचार प्रस्तुत हो रहे थे और
लोगों को ऐसा विश्वास था कि जैसा शुरू शुरू में होता है। वैसी खींचतान चलती
रहेगी परन्तु अंत में दोनों ही गठबंधन हो जाएंगे। परन्तु गुरुवार को देश के
राजनीतिक विश्लेषकों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब घोषित कर दिया
गया कि भाजपा-शिवसेना अलग अलग चुनाव लड़ेंगे, हां भाजपा के साथ पुराने
सहयोगी दल किसानों में पैठ रखने वाले शेतकारी संगठन, धनगर समाज की
पार्टी राष्ट्रीय समाज पक्ष एवं मराठा समाज के संगठन शिव संग्राम सेना अब
भी भाजपा के साथ हैं। विगत लोकसभा चुनाव के पहले दिवंगत भाजपा नेता
गोपीनाथ मुंडे ने चार छोटी क्षेत्रीय पार्टियों को भाजपा, शिवसेना गठबंधन से
जोड़ा था। रिपब्लिकन पार्टी (आठवले) भी भाजपा के साथ रहेंगे क्योंकि उन्हें
भाजपा ने राज्यसभा में भेजा था। कांग्रेस, राकांपा में क्या होगा कहा नहीं जा
सकता परन्तु महाराष्ट्र छोड़कर अन्य प्रांतों में भाजपा शिवसेना गठबंधन रहेगा
इसलिए चुनाव प्रचार के दौरान संभवत दोनों ही दल एक दूसरे पर हमला नहीं
करेगी। बहरहाल, महाराष्ट्र चुनाव पर गठबंधन टूटने का भारी असर होगा और
परिणाम क्या आते हैं कहा नहीं जा सकता परन्तु अगर नरेंद्र मोदी का जादू
महाराष्ट्र में चल गया तो परिणाम चमत्कारी हो सकते हैं जिसकी उम्मीद
विधानसभा चुनाव में बहुत कम है।