हर रूप में वंदनीया हो स्त्री!

sara sach

तुम स्त्री हो!
माँ !तुम दुनिया की सबसे सुंदर स्त्री हो
और तुमसे ही मैं हूँ
यह मैंने कब कहा
लेकिन फिर भी पत्नी ने सुन लिया
हे मेरी प्राण प्रिये!
दिल से कहते -सुनते हुए भी
मुखर हो
यह मैंने कब कहा
किसी अपरिणीता को
लेकिन फिर भी माँ ने सुन लिया
हे स्त्री!
इसी तरह बेटी ,बहिन ,बहू,दादी ,बुआ ,मौसी ,भाभी माँ
बिना विरोध किए
सब कुछ सुनते हुए भी
क्या कुछ नहीं हो तुम
कुछ भी हो तुम
हर रूप में प्यारी हो, आदरणीया हो
यह क्या कम है कि तुम हो
और हो अपने पूरे वजूद के साथ
इस लिए
याद रख पाती हो सब कुछ
सुख भी,दुख भी
बिना किसी
दर्द के
गर्व-गुमान के
लेकिन
कभी-कभी
भूल भी जाया करो कुछ
और ,
सारे गिले -शिकवे भूल
तुम बनी रहो
शव को शिव बनाने वाली
सृष्टि की रचयिता माँ !
हृदय -हार प्राण  प्रिये!
और वह सब कुछ जिससे दुनिया कोमलतम
और सम्मोहक बनती है।
यह भी मत भूलो कि
तुम ही तो नाना रूपों में
सृजनशील रहती हो !
तुम्हारे अलावा और कौन कर सकता है यह सब
यह भी तो मत भूलो कि
तुम्हीं हो ईश्वर की माया ,दुनिया भर की ममता
वात्सल्य की फुहार !
और यह भी तो है कि,
स्त्री कोई देह नहीं ,
संदेह नहीं,
श्रद्धा है
विश्वास है
पूर्णता है पुरुष की
तुम पत्नी बनकर पूर्णता दे रही हो पुरुष को
तुम प्रकृति हो
पुरुष की
या स्वतंत्र रूपा प्रकृति
जो भी हो ,हर रूप में वंदनीया हो स्त्री!

dr.gangapd sharma