गूँजते खण्डहर की गूँज दूर तक जाती है

skshukla

 (डॉ. सुधांशु शुक्ला) गूँजते खण्डहर डॉ. महेन्द्र शर्मा सूर्य द्वारा रचित प्रेमकथा पर आधारित उपन्यास है। उपन्यासकार ने प्रेमकथा को बहुत ही अनूठे  ढ़ंग से दर्शाया है, जिससे प्रेम का स्वरूप अत्यन्त व्यापक हो उठा है। प्रेम की महिमा केवल मात्र लौकिक जगत् तक ही नहीं है, उसकी व्यापकता देश-  काल की सीमाओं से परे, जन्म जन्मान्तरों तक होती है। यही कारण है कि प्रेम भारतीय संस्कृति में ही नहीं विश्व-जगत में आदर-सम्मान एवं  मंगलमयी पद पर आसीन है। विश्व साहित्य में एक से बढ़कर एक  प्रेम-कथाओं की चर्चा होती है, जैसे- रोमियो-जूलियट, लैला-मजनू, शीरी-फरहाद  आदि।

हिंदी साहित्य के भक्तिकाल को स्वर्ण काल ही शायद इसीलिए कहा गया है, जिसमें    राधा-कृष्ण का प्रेम, मीरा का प्रेम-भाव कृष्ण के प्रति हमें प्रेम की पराकाष्ठा तक ले जाता है, जो भक्ति कहलाता है। हमें कर्तव्यों के प्रति सचेत करता है। समाज की मर्यादा शालीनता को भंग नहीं होने देना चाहता। इसी प्रेम के स्वरूप को उपन्यास का नायक डॉ. सुधीर व्यक्त करता है,  ” मैं समाज का तरफ़दार हूँ, जो सदाचार से जीने का सलीका सिखाता है, व्यभिचार से मानव की रक्षा करता है।”

समीक्ष्य उपन्यास में प्रेम-कथा दो-स्तरों पर एक साथ धूप-छाँव की तरह घटित होती है। नायक डॉ. सुधीर और नायिका डॉ. सुधा एक साथ मैडिकल की पढ़ाई करते समय परस्पर एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। इनका प्रेम सांसारिक है, यह प्रेम शारीरिक आकर्षण नहीं है अपितु एक दूसरे के मान-सम्मान को समझते हुए कर्तव्य परायणता का संदेश देता है। यह कर्तव्य परायणता डॉक्टर समाज को उद्बोधित करती है, उनको डॉक्टर धर्म का पाठ पढ़ाती है। नायक गाँव में जाता है और रोगी उसे जो भी देता है, वह उसे लेकर आनंदित हो उठता है। मानव सेवा को अपना धर्म मानता है। जिसे पूरा करने में नायिका सुधा पूरा सहयोग देती है। सुधीर गाँव का आदर्श और मानवता की मूर्ति बन जाता है। सुधीर सर्वत्र मानव सेवा करता नज़र आता है।

नायक की धुन थी, उसका जुनून था कि वह गाँव में जाकर गाँव के लोगों के बीच उनकी सेवा करें। इस कार्य में उसकी प्रेयसी सुधा शादी से पूर्व ही उसका सहयोग देती है। एक मित्र के व्यंग्य का जबाव देते हुए कहती है- ” जब हमें डॉ. सुधीर पसंद है, तो इनकी हर बात पसंद है। आखिर गाँवों में भी तो हमारे देश की जनसंख्या का अधिकांश भाग रहता है और फिर हमारा पेशा भी तो मानव सेवा का ही है।” यह प्रेम का सच्चा स्वरूप, जो मात्र दो व्यक्तियों के शरीर का नहीं अपितु दो व्यक्तियों के मान-सम्मान का है, जो हमें दूसरों से प्रेम कराना सिखाता है।  ” ईश्वर की हर वस्तु को देखता ही नहीं, वह परम पिता परमात्मा का शुक्रिया अदा करने की तमन्ना रखता है, जिसने इंसान को क्या जानवर तक को सुन्दर बनाया है।”

डॉ. सुधीर गाँव विलासपुर में दो ढ़ाई वर्ष से रह रहा था, गाँव के लोगों ने बताया कि    – ” पास ही में एक भूतिया खण्डहर है, जहाँ घनी काली रात में  इस मकान के खण्डहर से तरह-तरह की आवाजें गूँजती रहती हैं, लोगों ने इस भूतहा घर का नाम ही गूँजते खण्डहर रख दिया था। किसी जमाने में यह मकान एक आलीशान महलनुमा था, जिसमें एक मारवाड़ी दम्पति अपनी इकलौती बिटिया के साथ रहते थे।”

नायक को प्रथम बार रात्रि में आते समय एक खूबसूरत नवयौवना लडकी मिली, जो कहती है- ” अरे बाबू जरा संभल कर चलना, पुलिया संकरी है। नायक के पूछने पर ‘तुम इतनी रात यहाँ क्या कर रही हो ? तुम्हारे माता-पिता, भाई कोई ऐतराज नहीं करते, तुम्हारे इस तरह यहाँ चले आने का?’ वह कहती है- ‘इंतजार में कब दिन बीत जाता है। इस बात का पता ही कब चलता है। मृत्यु के बाद सब रिश्ते ही खत्म हो जाते हैं तुम्हारी इस दुनिया में। साथी की तलाश ही तो कर रही हूँ।” वह अदृश्य हो जाती है। उसी समय नायक को कालर से पकड़े एक बूढ़ा सिग्नल मैन हाथ में लालटेन लिए खड़ा दिखता है “मरना चाहते हो क्या- जरा नीचे झांककर तो देखो, तुम कहाँ खडे हो, यहाँ से गिरते तो सीधे घाटी में नीचे बह रहे गहरे नाले में जाकर गिरते।”

यह जन्मान्तर की प्रेम कहानी उपन्यास के आरंभ से शुरू होती है। पूर्व जन्म की गंगा सुधीर को आकाश नाम से पुकारती है। इसी मुलाकात में रूह (आत्मा) कहती है- “तुम सुधीर नहीं, मेरे आकाश हो और मैं तुम्हारी जन्म-जन्मान्तरों की साथिन तुम्हारी दोस्त गंगा हूँ। तुम्हारा यह जन्म सुधा के लिए नहीं अपितु मेरे लिए हुआ है। पूर्व जन्म में तुम साहित्यकार थे, मैं तुम्हारी गंगा।” गंगा को सुधीर का चुपचाप सोते हुए निहारना अच्छा लगता है।

गंगा की तीसरी मुलाकात आगरा में होती है। वह सुधीर की प्रेयसी सुधा की रक्षा करने हेतु सुधीर के शरीर में प्रवेश करके उसकी शक्ति को दसगुना बढ़ाकर गुंडो से रक्षा करती है- ” आकाश लो मैं आ गई।” सुधीर को लगा जैसे गंगा उसके शरीर में प्रवेश कर गई है। सुधीर अब्बल दर्जे के कातिलों को मार-मार कर अधमरा कर देता है। गंगा सुधीर द्वारा अपने को स्वीकार न करने पर बहुत दुःखी होती है। परन्तु कोई प्रतिकार नहीं करना चाहती । यही सच्चा प्रेम था, जिसने कभी सुधीर का अनिष्ट नहीं किया।

शुद्ध रूह कभी किसी का अनिष्ट नहीं करती, यह सच्ची बात है। गंगा सुधीर को चौथी बार अमावस्या की काली रात में रेलवे लाईन पर मिलती है। उसे पूर्व जन्म की बात बताते हुए, वह स्थान दिखाती है जिस पर आकाश की लिखी पुस्तक रखी थी ‘गूँजते खण्डहर’। सुधीर को धीरे-धीरे सब याद आने लगा। कैसे गंगा और उसकी मृत्यु हुई। उसी क्षण बूढ़े सिग्नल मैन  ने सुधीर को देखकर कहा- “आज एक भटकती रूह को शायद मुक्ति मिल गई। मैं ही उस बदनसीब गंगा का पिता हूँ।” सुधीर ने उस गूँजते खण्डहर को दर्शनीय स्थल बनाकर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित किए। आज भी उस स्मरणीय स्मारक पर डॉ. सुधीर का जाना नियमित है।

उपन्यासकार ने सौ पृष्ठों के आकार में सच्ची प्रेम कथा को मानवता के साथ जोडा है। प्रेम हमें मानवीय धर्म को साधने के लिए प्रेरित करता है। यही कारण है कि प्रेम के द्वारा अच्छे नागरिक, अच्छे डॉक्टर बनते हैं। हडतालों और बंद से कितनी ही समस्याएँ पैदा होती हैं। यह दृष्टि भी मानव धर्म को दिखाती है।

मुख्य कथा सुधीर, गंगा और सुधा के बीच चलती है। वी. के. राय और अनीता सुधा के माता-पिता हैं, जो कथानक को गति देने वाले आदर्श माता-पिता हैं। बच्चों को समाज सेवा में लगा देखकर प्रसन्न होते हैं और अपनी जायदाद मानव सेवा में लगा देते हैं।

कथानक में कसाव है। घटना क्रम गति बनाए रखने के कारण कहीँ नीरस नहीं बनता। रोचकता, जिज्ञासा अंत तक बनी रहती है। सपाट बानी में सीधी-सादी प्रेम कहानी पाठक के मन को भाने वाली है। कहीं भी कल्पना, प्रकृति चित्रण और काव्यात्मकता का अतिक्रमण नहीं हुआ है। भाषा दृष्टि से भी सहज रूप से आए शब्द अर्थ की सार्थकता को सम्पन्न करने में सार्थक भूमिका निभाते हैं। पाठक को एक बार भी बोझिल और भ्रमित नहीं होना पड़ता। उपन्यासकार अपने उद्देश्य को पाठक तक पहुँचाने में सफल हुआ है। लघु उपन्यास ने गागर में सागर भरने का कार्य किया है। यह उपन्यास अपने नाम की सार्थकता को ध्वनित करने में सफल रहा है।

समीक्षा  (कृति- गूँजते खण्डहर, विधा- उपन्यास, लेखक- महेन्द्र शर्मा)

डॉ. सुधांशु शुक्ला

हंसराज महाविद्यालय,दिल्ली