न्याय व्यवस्था में सुधार की कवायद

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देश की प्रशासनिक संरचना को तय करते समय जिस बात का ध्यान
सबसे अधिक रखा गया था वह बात थी शासन व्यवस्था के तीनों अंगों के बीच
कार्य व शक्ति का पृथक्करण व सबसे ज्यादा इनके बीच समान संतुलन । चाहे
अनचाहे, गाहे-बगाहे ये तीनों ही राज्य के प्रशासनिक ढांचे
को स्थाई व दुरूस्त रखने के लिए आमने-सामने आते ही
रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों में विधायिका द्वारा लिए गए
अहितकर निर्णय या कानूनों के निर्माण में व्याप्त खामियां ,
राजनीति, व राजनीतिज्ञों का गिरता स्तर , अपराध व
भ्रष्टाचार में संलिप्तता आदि ने न्यायपालिका को अधिक मुखर
या कहें कि अति सक्रियता का अवसर दे दिया। इसका एक
दुष्परिणाम यह निकला कि न्यायपालिका जिस पर विवादों के निपटाने की अहम
जिम्मेदारी थी। उसने राज्य संचालकों के लिये दिशा निर्देशन की भूमिका भी
विवशतः अपने कंधों पर उठा ली और शायद यही सबसे बड़ी वजह रही कि
पिछले सिर्फ एक दशक में न्यायपालिका में शीर्ष स्तर से लेकर निचले स्तर तक
समाज में व्याप्त हर कुरीति व बुराई का समावेश देखने को मिल गया।शीर्ष
न्यायिक अधिकारियों पर भ्रष्टाचार में संलिप्तता से लेकर यौन अपराध किए जाने
तक के आरोप लगे। मामला सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि विख्यात
व प्रतिष्ठित न्यायविदों की आपसी छींटाकशी ने आम लोगों के सामने बहुत सी
अप्रिय बातें ला दीं । न्यायपालिका में बुरी तरह पैठ बना चुका भाई भतीजावाद
, लाबिंग, अवकाश प्राप्ति के पश्चात किसी पद पर पदारुढ़ होने/किए जाने की
संभावना के मद्देनजर सरकार के प्रति नरम दृदृष्टिकोण आदि ने यह जता दिया
था कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता व निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए वहां
भी सुधार की आवश्यकता है , विशेषकर न्यायपालिका के प्रशासन क्षेत्रा में।
हालांकि ऐसा नहीं था कि विधायिका या सरकार इस ओर कोई कदम
नहीं उठा रही थी । पूर्व की सरकारों ने जहां ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा
आयोग’ तथा ‘जजेस अकाउंटिबिलिटी बिल‘ पर कार्य व प्रस्ताव किया था, वहीं
नवगठित सरकार भी इस दिशा में कई नई संकल्पनाओं व विकल्पों पर कार्य
शुरू कर चुकी है । वर्तमान सरकार ने सबसे पहले उन कानूनों की छंटाई का
काम अपने जिम्मे लिया जो बरसों पुराने होने के साथ साथ आउटडेटेड यानी
औचित्यहीन हो गए थे।ऐसे लगभग छः सौ से अधिक छोटे बडे़ कानूनों का
अध्ययन करके उन्हें परिवर्तित या समाप्त/निरस्त करने की योजना प्रस्तावित
है। यहां यह उल्लेख करना दिलचस्प होगा कि अभी हाल ही में सर्वोच्च
न्यायालय में दायर की गई एक याचिका पर न्यायालय ने ऐसे ही पूर्व में निरस्त
किए जा चुके एक कानून के प्रयोग पर हैरानी जताते हुए सरकार से स्थिति
स्पष्ट करने के को कहा है।
सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति व पदोन्नति की प्रचलित
कालेजियम प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन की ओर भी वर्तमान सरकार कदम
बढ़ा चुकी है। पिछले कुछ समय से इस कालेजियम व्यवस्था पर येन केन
कारणों से प्रश्नचिन्ह लग रहे थे । कई पूर्व न्यायाधीशों ने भी समय समय पर
इस व्यवस्था पर टीका टिप्पणी करके अपना असंतोष व्यक्त किया है । नई
व्यवस्था में न्यायाधीशों के एकाधिकार की स्थिति को बदलने का प्रयास किया
गया है ।इसके अलावा नई सरकार ने देश भर में बहुत सारी अदालतों के गठन
की योजना, विवाद निपटान की गैर न्यायिक व्यवस्थाओं के विकल्प व
संभावनाओं पर कार्य योजना, अदालतों को पूरी तरह डिजिटलाइज्ड करके
पारदर्शी बनाना, गरीबों व निशक्तों को न्याय सुलभ कराने के लिए कई नई
व्यवस्थाओं व योजनाओं पर कार्य किया जा रहा है।

 


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