बाल विवाह से मुक्ति कब मिलेगी बेटियों को

bal vivah

हर साल करीब 14 लाख लड़कियों की शादी किशोरावस्था में कर दी जाती
है। उनसे उनका बचपन तो छीना ही जाता हैं, साथ ही उनके स्वास्थ्य और
शिक्षा के अधिकार भी छिन लिए जाते हैं। अगर इस दिशा में कठोर कदम नहीं
उठाए गए तो 2030 आते-आते हर साल 142 लाख बच्चियों की शादी
बाल-विवाह के रूप में की जाएगी। आज जब हर क्षेत्र में लड़कियां अपनी
सफलता के झंडे गाड़ रही हैं, वहीं हर सात में से एक लड़की की शादी उसके
पंद्रहवें जन्मदिन से पहले कर दी जाती हैं। इनमें से कुछ लड़कियों की शादी
तो आठ व नौ साल की उम्र में भी कर दी जाती है।
हमारे समाज का नजरिया बेटियों को लेकर हमेशा संकीर्ण रहता हैं। उनके
लिए बेटियां बस एक जिम्मेदारी और बोझ होती हैं, जिसे जल्द से जल्द पूरा
परिवार मुक्ति चाहता हैं। ऐसा नहीं है कि इस कुप्रथा का विरोध न हुआ हो, पर
इतने विरोध के बाद भी यह कुप्रथा जड़े जमाए हुए हैं। अशिक्षित और कम आय
वाले परिवार के लिए बेटियां हमेशा एक बोझ बन कर रहती हैं।
यूनिसेफ की रिपोर्ट की बात करें, तो हय कहा गया हैं कि आने वाले
50 साल तक भी भारत को बाल-विवाह जैसी कुप्रथा से छुटकारा नहीं
मिलेगा। उम्र से कच्ची लड़कियां मानसिक और शारीरिक रूप से न पत्नी बनने लायक होती है और
न ही मां बनने योग्य। शादी के बाद कम उम्र में मां बनने का खतरा तो होता
ही है। घरेलू हिंसा और एचआईवी व एड्स जैसी बीमारियों की भी शिकार हो
जाती हैं। छोटी बच्चियां जब कम उम्र में शादी के बंधन में बंधती हैं, तो शायद
उनके अपने मां-बाप को भी इस बात का अंदाजा नहीं होता कि आने वाले समय
में उनका जीवन कितना कष्टमय हो सकता हैं। भारत विश्व में बालिका वधू
के मामले में सबसे आगे हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 20-24 साल
की लगभग 47 फीसद महिलाएं ऐसी हैं, जिनकी शादी 18 साल से पहले हो
गई थी।

दूर-दूराज के गांवों में या छोटे-बड़े शहरों में आज भी
यह कुप्रथा कई परिवारों में फल-फूल रही हैं। ऐसी
महिलाएं जिनकी खुद की शादी बचपन में हुई थी वह
भी अपनी बच्ची की शादी कम उम्र में कर के खुश होती
हैं जबकि छोटी उम्र में गृहस्थी की जिम्मेदारी उठाने की
परेशानी वह झेल चुकी होती हैं। सब कुछ समझते हुए
भी एक मां अपनी बेटी के लिए अपने जैसा ही जीवन
चुनती है।

पिछले दिनों कलर्स पर प्रसारित बालिका वधू की आनंदी की कहानी हमारे
देश की बालिका वधुओं से काफी मिलती हैं। छोटी सी उम्र में उनसे शिक्षा का
अधिकार छीन कर विवाह की वेदी पर बैठा दिया जाता हैं। कई बार तो लड़कों
की उम्र बड़ी होती हैं पर कई बार लड़कों की उम्र लड़की की उम्र से चार गुणा
बड़ी होती हैं। भारत के अलावा यह बांग्लादेश, नेपाल, जांबिया, इथोपिया,
सोमालिया, गुआना, और चाड जैसे कई देशों में बाल-विवाह आज भी एक
अभिशाप है। छोटी-छोटी बच्चियां ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं जिनके लिए
वे तैयार भी नहीं होती। ऐसी कुरीतियों के कारण उनकी सेहत और शिक्षा दोनों
पर बुरा असर पड़ता हैं और आने वाली कई पीढि़यां इस कुप्रथा की शिकार होती
रहती हैं।
दूर-दूराज के गांवों में या छोटे-बड़े शहरों में आज भी यह कुप्रथा कई
परिवारों में फल-फूल रही हैं। ऐसी महिलाएं जिनकी खुद की शादी बचपन में
हुई थी वह भी अपनी बच्ची की शादी कम उम्र में कर के खुश होती हैं जबकि
छोटी उम्र में गृहस्थी की जिम्मेदारी उठाने की परेशानी वह झेल चुकी होती हैं।
सब कुछ समझते हुए भी एक मां अपनी बेटी के लिए अपने जैसा ही जीवन
चुनती है।
कही सामाजिक दबाव, कहीं सुरक्षा का डर, तो कही निरक्षरता इसकी वजह
बनती है। केरल में साक्षरता दर बहुत ज्यादा हैं- इसलिए वहां बाल-विवाह
जैसी कुप्रथा लगभग खत्म होने को है। अगर राजस्थान की बात करें तो तमाम
रोक के बावजूद बाल-विवाह आज भी बेधड़क होते हैं।
बाल-विवाह का सबसे मुख्य कारण हैं लोगों में शिक्षा और जागरूकता की
कमी। इस कुप्रथा को रोकने की पहल हमें खुद करनी होगी। इससे जुड़े कानूनों
के नियम का पालन करना होगा और सबसे बड़ी बात ऐसे जड़ से खत्म करने
के लिए हमें बेटियों को शिक्षित करना होगा।