भारतीय संस्कृति के पोषक थे मालवीय जी

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Madam mohan

पण्डित मदन मोहन मालवीय
जी का जन्म 25 दिसम्बर 1861 को
प्रयाग में हुआ था। आपके पिता श्री
बृजनाथ जी कथावाचक थे। मालवा से
आने के कारण इनका परिवार मालवीय
कहलाया था।एक बार महात्मा गांधी
जी ने कहा था-मैं मालवीय जी से बड़ा
देशभक्त और किसी को नहीं मानता।
मैं सदैव उनकी पूजा करता हूं।मालवीय
जी गौ-गंगा-गीता और गायत्री को
भारतीय संस्कृति का आधार मानकर
इनके प्रचार-प्रसार व संरक्षण की दिशा
में सदा प्रयासरत रहे।
इनकी वकालत भी अनोखी तरह
की थी। कहते हैं कि सामाजिक कार्यों
के कारण इनका मन इस ओर कम
था। प्रायः यह अपने केस दूसरों को दे
दिया करते थे।स्वतन्त्राता आन्दोलन
के दौरान हुए प्रसिद्ध चोरा-चौरीकाण्ड
के 151 अभियुक्तों को सेशन जज ने
फांसी की सजा सुनाई थी। मालवीय
जी ने इन अभियुक्तों की हाइकोर्ट में
जबरदस्त पैरवी की और इन सबको
बचा लिया।
मालवीय जी ने 4 फरवरी 1916
को वसन्त पंचमी के दिन काशी हिन्दू
विश्वविद्यालय की नींव रखी और इसके
लिए पूरे देश में यात्रा करते हुए धन
एकत्र किया।
उन्होंने 1919 से 1939 तक इसके
उपकुलपति पद का दायित्व भी निभाया।
भारतीय संस्कृति के पोषक
थे मालवीय जी
हरिद्वार के ब्रहमकुण्ड में आने वाली
गंगा की अविच्छिन्न धारा को न रूकने
देना और गंगा सभा की स्थापना मालवीय
जी का एक महत्त्वपूर्ण कार्य कहा।
घटना 1914 की है। अंग्रेज सरकार ने
गंगा की उस धारा पर बांध बनाने की
योजना बना ली जो हर की पैड़ी
(हरिद्वार) के ब्रहमकुण्ड आती थी। इससे
पुरोहित समाज व सन्तों-महन्तों में
रोष उत्पन्न हो गया। उस समय पंमदन
मोहन मालवीय ने सन्त समाज
की अगुवाई करते हुए बांध न बनने
देने तथा गंगा की धारा न रूकने देने
के लिए आन्दोलन छेड़ दिया। यह
आदोलन एक बड़ा जनान्दोलन बन
गया। इस आन्दोलन को दरभंगा नरेश,
जयपुर नरेश, अल्वर नरेश, कलकत्ता
के न्यायाधीश सहित श्री सुखबीर सिंह
एम.एल.सी. मुजफ्फरनगर रिटायर्ड चीफ
इंजीनियर राजा ज्वाला प्रसाद, पंदेवरत्न
शर्मा, महंत लक्ष्मण दास आदि
का भरपूर समर्थन व सहयोग मिला।
परिणामस्वरूप तत्कालीन गवर्नर
ने कहा कि धारा नं. 1 जिसका जल
हर की पैड़ी, पहंुचता है पर कोई बांध
नहीं बनेगा किन्तु यह बात नहर विभाग
ने नहीं मानी और धारा नं. 1 पर बांध
बनाना चाहा।अब तो पुनः यह आन्दोलन
शुरू हो गया। देशभर में जनसभाएं व
प्रदर्शन होने लगे
दो वर्षों तक यह सिलसिला
चला और इस जनान्दोलन से गवर्नर
जेम्स मेस्टन की कुर्सी हिल गयी।सन्
1916 की 18-19 दिसम्बर को हरिद्वार
में एक विशाल सम्मेलन हुआ जिसमें
देश की विख्यात रियासतों जयपुर,
ग्वालियर, बीकानेर, पटियाला, बनारस,
अलवर, कासिम बाजार के राजा तथा
तत्कालीन हिन्दू नेता शामिल
हुए।सरकारी प्रतिनिधियों से हुए वाद
विवाद में सरकार को आन्दोलन की
भावना के सामने झुकना पड़ा। अब
एक लिखित समझौता हुआ कि हर की
पैड़ी से एक मील नीचे तक कोई बांध
नहीं बनाया जाएगा।

 


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