सौंदर्य और संस्कृति में सिक्किम भी कम नहीं!

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तिब्बती भाषा, संस्कृति व बौद्ध धर्म के शोधार्थियों के लिए
रिसर्च इंस्टीट्यूट आफ तिब्बतोलोजी एक अद्वितीय संस्थान है।
इसकी प्रसिद्धि विश्व भर में है। यहां संग्रहालय में दुर्लभ
पांडुलिपियों, पुस्तकों, मूर्तियों, कलाकृतियों का अनूठा संग्रहgangtok-city-sikkim
है। विशेषकर थंका पेंटिंग का वृहदाकार रूप तो यहां के
संग्रहालय की अनमोल धरोहर है। इस संस्थान की नींव 1957
में दलाई लामा ने डाली थी। गंगटोक से लगभग सात
किलोमीटर दूर गणेश टाक से गंगटोक के पूर्वी हिस्सों एवं
कंचनजंघा पर्वतमाला का शानदार नजारा दिखता है। कुटीर
उद्योग संस्थान हस्तनिर्मित वस्तुओं, विशेषकर शालों, गुडि़यों,
कालीनों आदि के लिए प्रसिद्ध है।

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है और रंगबिरंगे पक्षियों से सुसज्जित
पक्षीशाला भी। मठ में विश्व की कुछ
अद्भुत धार्मिक कला.तियां भी संग्रहीत
हैं। हर साल जून माह में इस स्थान
पर धार्मिक समारोह का आयोजन भी
किया जाता है।
51.76 वर्ग किलोमीटर में फैला
फंबोंग लो वाइल्ड लाइफ सेंक्चुअरी
गंगटोक से पच्चीस किलोमीटर दूर
है। यहां रोडोडेंड्रोन, ओक, किंबू, फर्न,
बांस आदि का घना जंगल तो है ही
साथ ही यह दर्जनों पशुओं का आवास
भी है। सेंक्चुअरी में पक्षियों एवं तितलियों
की अनेकानेक प्रजातियां मौजूद हैं।
गंगटोक सड़क मार्ग द्वारा सिलिगुड़ी,
न्यू जलपाईगुड़ी, बागडोगरा, दार्जिलिंग,
कलिंगपोंग आदि शहरों से जुड़ा हुआ
है। सिलिगुड़ीघ्114 किलोमीटर, न्यू
जलपाईगुड़ीघ्125 किलोमीटर गंगटोक
के दो निकटतम रेलवे स्टेशन हैं।
बागडोगराघ्124 किलोमीटर गंगटोक का
निकटतम हवाई अड्डा है। बागडोगरा
से पर्यटक हेलीकाप्टर द्वारा भी गंगटोक
पहुंच सकते हैं। सिलिगुड़ी से गंगटोक
जाने के लिए टैक्सियां एवं बसें आसानी
से मिल जाती हैं।
विदेशी पर्यटकों को सिक्किम में
प्रवेश के लिए परमिट बनवाना आवश्यक
है। विदेशियों के लिए अधिकतम पंद्रह
दिन का परमिट बनता है। सिक्किम में
पालीथीन नहीं मिलती। अगर आपको
इनकी जरूरत हो तो अपने साथ ले
कर जाएं।


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